
आज कल छज्जा बालकनी बन गया है।
नाश्ता दलिया काअब मैक्रोनी बन गया है।।
आजकल नाम टुन्नु अब टोनी बन गया है।
राधा का रूप आजकल सलोनी बन गया है।।
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तख्त चारपाई की बातआज पुरानी हो गई है।
पैदल बाजार जाने की बात नादानी हो गई है।।
बिना फोन करे जाने की बात कहानी हो गई है।
जल्दी शादी की बातआज पानी-पानी हो गई है।।
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सूट-बूट जेंटलमैन अब हर आदमी हो गया है।
जाने कौन से नशे में आज आदमी खो गया है।।
नफरत की बातेंआज हर दिल में कौन बो गया है।
अपनी ही आदतों से आज हर आदमी रो गया है।।
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घड़ा सुराही पत्तल पर भोजन सब कुछ भूल गए हैं।
आधुनिकता की इस नशीली दौड़ में फूल गए हैं।।
संस्कार संस्कृति को लगा अब बस धूल गए हैं।
नर्म दूब घास की जगह हर राह में बिछ शूल गए हैं।।
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छोड़ कर सच का सूरज बस झूठ को ही भा गए हैं।
मोबाइल से चिपके ऐसे जैसे परमात्मा को पा गए हैं।।
छोड़ कर रोशनी बस चमक- दमक में छा गए हैं।
जाने कहां से कहां आज हम सब आ गए हैं।।
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रचयिता।।एस के कपूर”श्री हंस”
बरेली।।
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