
हर दिन कविता होती कब है।
भाव सिसकता मोती कब है।।
ढुलक-ढुलककर आँसू पूछे…
आँखें मेरी रोती कब है।
बिस्तर की सिलवट भी चुभती..
जगती आँखें सोती कब है।
उजड़े दिल की बगिया में अब..
यार! तमन्ना होती कब है।
नज़्म-तरानों को सुन ‘वरदा’..
अल्फाजों में खोती कब है।
वर्तिका अग्रवाल ‘
हर दिन कविता होती कब है।
हर दिन कविता होती कब है।
भाव सिसकता मोती कब है।।
ढुलक-ढुलककर आँसू पूछे…
आँखें मेरी रोती कब है।
बिस्तर की सिलवट भी चुभती..
जगती आँखें सोती कब है।
उजड़े दिल की बगिया में अब..
यार! तमन्ना होती कब है।
नज़्म-तरानों को सुन ‘वरदा’..
अल्फाजों में खोती कब है।
वर्तिका अग्रवाल ‘वरदा’
वाराणसी
उ.प्र.
वरदा’
वाराणसी
उ.प्र.




