
प्रेम कोई वस्तु नहीं, जिसे पाया या खोया जाए।
यह तो स्वयं के भीतर की वह खिड़की है,
जहाँ से दुनिया अधिक सुंदर,और स्वयं का अस्तित्व अधिक अर्थपूर्ण दिखाई देता है।प्रेम वह शांत मौन है,जहाँ दो आत्माएं बिना कुछ कहे,सब कुछ समझ लेती हैं। जहाँ ‘मैं’ का अहंकार ‘हम’ की मिठास में घुल जाए। प्रेम किसी को बाँधने का नाम नहीं, बल्कि उसे अपनी तरह से खिलने के लिए आकाश देने का नाम है। दूसरे के दुःख को अपना मान लेना और उसकी ख़ुशी में अपनी मुस्कान ढूँढ लेना।किसी के गुणों के साथ-साथ उसकी कमियों को भी वैसे ही अपनाना, जैसे वह है। यही तो है प्रेम।
-डॉ. दक्षा जोशी’निर्झरा’
अहमदाबाद, गुजरात।




