
एक कवि की प्रेमिका ने कवि से कहा कि तुम दूसरे की सुंदरता पर खूब तारीफ लिखते हो। कभी मेरी सुंदरता पर कोई बखान नही करते हो। क्या मैं असुंदरी हूँ ? मेरे अंदर सौंदर्यरस की कमी है। तुम एक साहित्यिक शब्दों में मेरी तारीफ करों नहीं तो मैं अपने प्रेम संबंध को संबंध विच्छेद कर दूंगी।
कवि का हृदय डगमगा गया। एक भयंकर सैलाब सा आ गया। कवि ने महसूस किया कि अगर वह छोड़कर चली जायेगी तो वह अनाथ हो जायेगा। उसका सच्चा प्रेम निर्धन हो जायेगा। उसकी कविताओं में जो लय, ताल, स्वर तथा स्पन्दन है, भावना का सृजन है। वह मौत के मुंह में चला जायेगा।
कवि ने लड़खड़ाते हुये कागज कलम उठाया। प्रिये! तुम्हें पाने की जिद थी। तुम्हारे होंठो की जो नरमियां है वह मुझ पर खूब असर किया था। तुम्हारे लहराते बालों में गेहूं की बालियों की तरह लचक है। लाल कपोल में जो सौंदर्य झलक रहा है। सुंदर परी जैसा है। मन के भावों में जो निर्मलता है, वह सहज ही किसी को आकर्षित कर लेगा।
तुम्हारी चाल हिरनी जैसी है जो दूर तक सौंदर्य बिखेरता है। तुम्हारी तन-मन में जो स्पन्दन है। वह छुने मात्र से पत्थर भी पिघल सकता है। तुम्हारे नयनों में जो अभिराम है वह एकटक निहारने की प्रिय इच्छा बनी रहती है। तुम सौंदर्य की देवी हो। एक कवि तुम्हारे इन सब गुणों से आकर्षित हो गया और तूम्हारे प्रेमपाश में बंध गया।
प्रेमिका को इस तारीफ से घोर निराशा हुई और वह यह समझ गयी कि कवि के इन शब्दों के वार से मैं पूर्णतया न्यौछावर हो गयी हूँ। इस तरह से यह कवि जिस सुंदरी के सौंदर्य का वर्णन करता होगा। इस कवि के चरणों में हजारों नायिकायें तो नतमस्तक हो जाती होंगी।
यह कवि आवारा लगता है। इसके प्रेम में सच्चाई नहीं लगती है। मैं इसके चक्कर में नहीं रहूंगी। वह कवि की कलम कागज लेकर भाग गयी। इसके साथ ही इसके लेखन का सौंदर्य लेकर चली गयी। तब से कवि बेचारा उस प्रेमिका को ढूंढ रहा है। तब से कवि आवारा हो गया। अपनी लेखनी, काजल, कलम ढूंढ रहा है। अपने सच्चे प्रेम को ढूंढ रहा है।
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जयचन्द प्रजापति ‘जय’
प्रयागराज




