
औरत को बाँधने की
ज़ुरूरत नहीं पड़ती कहीं,
रस्सी या जंज़ीर का
यहाँ काम क्या है?
कोमल है देह उसकी,
कोमल है भाव उसके,
बाँधे जो उसे,
भला ऐसा कोई ठौर-धाम क्या है?
ग़र दे दो प्यार उसको,
मान दो पूरा जग में,
जी-जान से निछावर हो,
प्रेम का ये पयाम क्या है?
बन्धन तो है सिर्फ़ उसका,
सम्मान और प्यार जहाँ,
इसके बिन नारी का वजूद,
भला ‘शून्य’ से कम क्या है?
-डॉ. दक्षा जोशी’निर्झरा’
अहमदाबाद, गुजरात।




