साहित्य

कारगिल विजय-दिवस

सुषमा श्रीवास्तव

भावभरे श्रद्धावनत उर सहित,

श्रद्धासुमन समर्पित करने को आए।

आँखें नीर भरी बदली मेरी,

मस्तक गर्वोन्नत्त है मेरा,

उस पावन धरा पर जन्मीं हूँ,

जहाँ वीरों का ही मेला है।

3 मई 1999 को दुस्साहस कर आतंकी चढ़ आए पहाड़ियों पर,

भारतीयों सपूत लालों को पल भर भी रास न आई।

घमासान युद्ध छिड़ गया जो,

घाटी और पहाड़ों से।

जो चला 60 से ऊपर दिन तक।

अंततः घुसपैठियों को तो, मुँह की खानी थी ।

मेरे वीर सपूतों को तो अपना, आलीशान तिरंगा जाकर गिरि पर लहराना था।

कितनी मांँओं की गोद हुई सूनी,

सबलाओं  की मांँग हुई सूनी,

बहनों की ऊंँगलियों में रक्षासूत्र रह गए प्रतीक्षित,

आने वाली श्रावणी पर।

कितने घायल शरीर हुए,

कुछ गिनती नहीं है उनकी।

तब जाकर कहीं 26/07/1999 को,

लहराया तिरंगा पहाड़ी पर।

हुंँकार उठे वे वीर सेनानी,

जिसने जीत की ठानी थी।

घुसपैठियों को घर से खदेड़ने की,

शपथ निज उर से लीन्हीं थी।

तबसे लेकर आज तलक 27 वर्ष हुए पूरे ,

‘कारगिल-विजय-दिवस’

देश मनाता है प्रतिवर्ष।

आगामी नवांकुरों को देशभक्ति का पाठ पढ़ाता,

बलिदानी शहीदों के पराक्रम का जौहर सिखलाता।

कोटि-कोटि नमन,वंदन कर,  हम स्मृति- कुसुमांजलि  अर्पित करते हैं। 🙏🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🙏

बड़े गर्व से हम प्रतिवर्ष

अवर्णनीय

वीरगाथा का गुणगान करते हैं।

 

रचनाकार- सुषमा श्रीवास्तव, मौलिक भाव, सर्वाधिकार सुरक्षित, रुद्रपुर, उत्तराखंड।

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