
आओ मिलकर रथ के संग में प्रेम की डोरी थाम चलें,
जगन्नाथ के पावन पथ पर श्रद्धा के दीपक हम ले जलें।
शंख बजे जयघोष गूँजे नभ भी गाए मंगल गान
भक्तों के हर धड़कन में है मेरे प्रभु का पावन नाम।
बलभद्र संग सुभद्रा बैठीं शोभा जिसकी न्यारी है
भक्ति की सरिता में बहती हर आँख आज पुजारी है।
रथ के पहिए घूम रहे हैं भाग्य सभी के खोल रहे
सूने मन के हर आँगन में आशा के अंकुर बो रहे।
रस्सी खींचे प्रेम का सागर जाति-पाँति सब भूल गए
एक प्रभु के चरणों में आकर ऊँच-नीच के फूल झरे।
जय जगन्नाथ गूँज रहा है हर गलियों, हर द्वारों में
करुणा बरसे मेघ बनाकर, भक्तों के परिवारों में।
जो भी श्रद्धा लेकर आया खाली हाथ न लौट सका,
दीन-दुखी के आँसू लेकर प्रभु ने हर संताप हर लिया।
चलो चलें उस रथ के पीछे मन को निर्मल, शुद्ध करें
जगन्नाथ की कृपा से मिलकर प्रेममय जीवन स्वयं गढ़ें।
कुलदीप सिंह रुहेला
सहारनपुर उत्तर प्रदेश




