
बर्षा हुई रिमझिम, मन करे गुनगुन,
अति मन उमंग है, अब भीग जाइए।
हरियाली चहुँ ओर, घटा छाई घन घोर
काले है बदरा जो, मन को भिगाइए।
प्रकृति सुंदर अति, मोहित करती वही,
झरने की कल-कल, बैठ सुनजाइए।
नदी कूप ताल सब, उफन रहे हैं अब,
धरा तो मुस्कुरा रही, कजरी तो गाइए।
डॉ उषा अग्रवाल जलकिरण
छतरपुर मध्यप्रदेश




