साहित्य

धरती के नीचे 

मधु वशिष्ठ

धरती के नीचे बहुत शोर था धरती के नीचे भी,

सब जड़ें आपस में मिलती थीं।

ऊपर से जब काटते थे पेड़,

नीचे जड़ें सिसकती थीं।

 

जड़ों ने अपना जमीन के नीचे संसार बसाया,

दूर-दूर तक फैल-फैल कर एक-दूजे का साथ निभाया।

 

लकड़हारे ने पेड़ों पर जब आरा चलाया,

नीचे जड़ों के संसार का जी बहुत घबराया।

 

“कैसे मिलेंगे अब बरगद और पीपल?”

“टहनियां तो बहुत ऊँचे हिलाते थे।

कभी-कभी तो हिल-मिल दोनों वृक्ष,

अशोक वृक्ष को भी चिढ़ाते थे।”

 

“यह क्या, मानव ने आम-जामुन को भी नहीं छोड़ा!

मूर्ख हो गया मानव क्या?

उसने अपना भी ख्याल नहीं किया थोड़ा?”

 

“काट-काट कर सारे वृक्ष,

ये खाना कहाँ से खाएंगे?”

पीपल की जड़ बोली –

“वट दादा, खाने की छोड़ो,

ये ऑक्सीजन कहाँ से पाएंगे?”

 

आज का मानव

बहुत विकसित और शिक्षित है, ऐसा लोग कहते थे।

परंतु हम तो इनके पूर्वजों के राज में ही सुरक्षित थे।

 

भूमि के नीचे बैठक की थी सारी जड़ों ने,

फिर से जड़ों ने अपनी ऊर्जा लगाई,

और किसी तरह उन कटे हुए ठूंठों में भी,

छोटी-छोटी सी कोपलें उग आईं।

 

वो बेचारी जड़ें क्या जानें, मानव ने क्या ठाना है?

और कुछ दिनों में बनाएंगे पुल,

खोद लेंगे वे सारी जड़ें भी,

क्रूर मानव के द्वारा फूल पत्तों तक को भी तो नोंचा जाना है।

 

मधु वशिष्ठ फरीदाबाद हरियाणा।

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