साहित्य

माँ-बाप को पहले रोटी दो

कुलदीप सिंह

माँ-बाप को पहले रोटी दो बाद में अपने आप खाना

जीते जी पूछ लो उनको वरना कल का नहीं ठिकाना।

 

जिन उँगली पकड़ चलाया तुमको उनको मत ठुकराना

उनकी सेवा से बढ़कर जग में कोई नहीं ख़ज़ाना।

 

माँ ने अपने हिस्से की रोटी हँसकर तुम्हें खिलाई,

बाप ने अपने सपने बेचकर, जीवन की राह बनाई।

 

आज वही बूढ़ी आँखें बेटा तेरी राह निहारें

दो मीठे बोलों की ख़ातिर दिन-रात आँसू धारें।

 

मोबाइल में दुनिया ढूँढ़ोगे, सुख फिर भी न पाओगे

माँ-बाप का दिल जो तोड़ोगे, चैन कहाँ से लाओगे।

 

दौलत, शोहरत ऊँचे महल सब यहीं पड़े रह जाएँगे

माँ-बाप की सच्ची दुआएँ ही साथ तुम्हारे जाएँगे।

 

आओ मिलकर प्रण ये करें उनका मान बढ़ाना

माँ-बाप को पहले रोटी दो बाद में अपने आप खाना।

 

 

 

कुलदीप सिंह रुहेला

सहारनपुर उत्तर प्रदेश

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