
पंजाब के एक छोटे-से शहर में हरप्रीत कौर नाम की एक होनहार लड़की रहती थी। बचपन से ही उसका एक ही सपना था—लंदन जाकर पढ़ाई करना, बड़ी डिग्री हासिल करना और अपने माता-पिता का नाम रोशन करना।
कड़ी मेहनत के बाद आखिर वह दिन भी आ गया, जब उसे लंदन के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में दाखिला मिल गया। पूरे परिवार में खुशी की लहर दौड़ गई। माता-पिता की आंखों में गर्व था और हरप्रीत की आंखों में सुनहरे सपने।
लेकिन एक बड़ी समस्या थी—पैसे।
उसके माता-पिता के पास इतनी बड़ी रकम नहीं थी। उन्होंने अपनी सारी जमा-पूंजी लगा दी, रिश्तेदारों से मदद ली और लगभग एक करोड़ रुपये का शिक्षा ऋण लेकर अपनी इकलौती बेटी को लंदन भेज दिया। उन्हें पूरा विश्वास था कि उनकी बेटी पढ़-लिखकर एक दिन सब कुछ चुका देगी और उनका जीवन बदल देगी।
एयरपोर्ट पर विदा करते समय उसकी मां ने उसे गले लगाकर कहा, “बेटा, अपना ध्यान रखना। पढ़ाई पूरी करके जल्दी लौट आना।”
पिता ने मुस्कुराते हुए कहा, “तू बस अपने सपने पूरे कर। हमारी सारी खुशियां तेरे साथ हैं।”
हरप्रीत सुरक्षित लंदन पहुंच गई। वह रोज़ अपने माता-पिता से वीडियो कॉल पर बात करती। कभी कॉलेज दिखाती, कभी नई सड़कें, कभी अपनी लाइब्रेरी। वह कहती, “मां, यहां सब कुछ बहुत अच्छा है। मैं खूब मेहनत करूंगी।”
माता-पिता उसकी बातें सुनकर हर दिन भगवान का धन्यवाद करते।
लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।
अभी उसे लंदन गए सिर्फ एक महीना ही हुआ था।
एक शाम वह कॉलेज से अपने कमरे की ओर लौट रही थी। तभी अचानक करीब 40 वर्ष के एक व्यक्ति ने उस पर चाकू से हमला कर दिया। आसपास मौजूद लोगों ने उसे बचाने की कोशिश की और तुरंत एम्बुलेंस बुला ली, लेकिन उसके घाव बहुत गहरे थे।
ज़िंदगी और मौत के बीच संघर्ष करती हरप्रीत की आंखों में अपने माता-पिता की तस्वीर थी। हिचकियां लेते हुए उसके होंठों से आखिरी बार निकला—
“मां… पापा…”
और फिर उसकी आंखों में बसे सारे सपने हमेशा के लिए बुझ गए।
उधर पंजाब में उसके माता-पिता रोज़ की तरह शाम को बेटी के वीडियो कॉल का इंतज़ार कर रहे थे। तभी टीवी पर ब्रेकिंग न्यूज़ चली—
“पंजाब की एक छात्रा की लंदन में चाकू मारकर हत्या।”
पहले तो उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ।
कुछ ही देर बाद फोन की घंटी बजी।
फोन के दूसरी तरफ़ से मिली खबर ने उनकी दुनिया उजाड़ दी।
मां ज़मीन पर गिरकर बिलख-बिलखकर रोने लगी। पिता की आंखों से आंसू बहते रहे, लेकिन उनके होंठों से एक शब्द भी नहीं निकला।
जिस बेटी को उन्होंने अपने सपनों और करोड़ रुपये के कर्ज़ के सहारे विदेश भेजा था, वह अब कभी लौटकर उनसे बात नहीं करेगी।
घर का वह कमरा, जिसमें उसकी किताबें, खिलौने और बचपन की यादें थीं, अब हमेशा के लिए खामोश हो गया।
हरप्रीत लंदन अपने भविष्य को संवारने गई थी। वह अपने माता-पिता का सहारा बनना चाहती थी। लेकिन एक हिंसक घटना ने उसके सारे सपनों को अधूरा छोड़ दिया।
यह कहानी हमें याद दिलाती है कि विदेश पढ़ने जाने वाले हर छात्र के पीछे एक परिवार की मेहनत, त्याग और उम्मीदें होती हैं। अधिकांश छात्र सुरक्षित रहते हैं और अपने सपने पूरे करते हैं, लेकिन जब ऐसी दुर्लभ और दुखद घटनाएं होती हैं, तो उनका दर्द पूरे परिवार को जीवनभर के लिए बदल देता है।
कुछ सपने मंज़िल तक पहुंचते हैं…
और कुछ सपने हमेशा के लिए अधूरे रह जाते हैं।
नाम सपना कुमारी कोल्हापुर




