
सबकी खातिर दीप जलाकर, खुद अँधियारों में रहता हूँ।
मर्द हूँ मैं, चुपचाप मगर, हर पीड़ा को सहता हूँ॥
होंठों पर मुस्कान सजाकर, ग़म की गठरी ढोता हूँ। टूट न जाए कोई अपना, इस डर से कम रोता हूँ॥
सपनों को कंधों पर लेकर, दूर क्षितिज तक जाता हूँ। अपनी चाहत भूल-बिसरकर, सबका भाग्य बनाता हूँ॥
घर की हँसी सलामत रहे, बस इतना अरमान रहा। मेरे हिस्से धूप ही आई, उनके हिस्से छाँव रहा॥
सबकी खातिर दीप जलाकर, खुद अँधियारों में रहता हूँ। मैं मर्द हूँ, चुपचाप मगर, हर पीड़ा को सहता हूँ॥
किससे अपने घाव कहूँ मैं, किसको मन की बात लिखूँ। भीतर जितना शोर मचा है, उतना बाहर मौन दिखूँ॥
दिन जिम्मों की धूप में बीते, रातें चिंता में ढलती हैं। थकी हुई इन आँखों में भी, नई सुबहें पलती हैं॥
ठोकर खाकर फिर उठ जाना, शायद मेरी फितरत है। अपनेपन की आस बचाए, जी लेना ही हिम्मत है॥
सबकी खातिर दीप जलाकर, ख़ुद अंधियारों में रहता हूँ।
मर्द हूँ लेकिन इंसान हूँ मैं,हर पीड़ा चुपचाप सहता हूँ।।
एक दुआ है रब से मेरी, इतना सा उपकार रहे। सबकी खुशियाँ कायम रहें, मेरा भी सत्कार रहे॥
मत समझो पत्थर का दिल है, मुझमें भी अरमान कई। मैं भी चाहूँ प्रेम मिले कुछ, सुख के हों कुछ पल नए॥
सबकी खातिर दीप जलाकर, ख़ुद अंधियारों में रहता हूँ।
मर्द हूँ लेकिन इंसान हूँ मैं,हर पीड़ा चुपचाप सहता हूँ।।
*कवि दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’*
*जनपद संभल उत्तर प्रदेश*




