
आए—- मेघा,
लाए—– मेहा,
टूट के बरसा पानी।
नेह ——–लुटाए,
जग—— हर्षाए,
गगन घटा घहरानी।।
श्वेत श्याम से,
घन प्रकाम से
घिर घिर बदरा आनी।
घनन घनन घन
मेघा —– गर्जन ,
विचर रहे मनमानी।।
टप टप टप टप
छपछ्प छपछप
जल ही जल लहरानी।
मेघा —–आए,
मेहा—–लाए,
टूट के बरसा पानी।।
सखी सयानी,
बरखा–आनी,
धरा हुलस उमगानी।
कहाँ— उठाऊँ ,
कहाँ—बिठाऊं
करूं कैसे अगवानी?
आयी—–द्वारे,
बाँह —–पसारे,
गले लग लग मुस्कानी।।
आए —–मेघा,
लाए—–मेहा
टूट के बरसा पानी।
हरे भरे —–से,
धुले पात—-से
झूमें वन थिरकानी।
ताल— तलैया,
पोखर– — कुईया,
जल पूरित अभिमानी।
सब —- – नद नाले,
हुए—— कुचाले
तटनी तट अवमानी।।
आए ——मेघा,
लाए——मेहा,
टूट के बरसा पानी।
अंक शायिनी
चपल दामिनी,
तड़ित रेख चमकानी।
कड़क कड़क कर ,
अट्टहास — – कर,
वारिद हुए अभिमानी ।
देख —- तुम्हारा,
रौद्र —– प्रहारा ,
अंतर भीत जगानी।।
घटा —–घनेरी,
रैन —- अंधेरी ,
महल आन बरसानी।
भीगे——सारी
मन —-फुलवारी ,
राग सुरीला गानी।
नव—– स्पंदन ,
मधुरिम– मंथन,
लागे सेज सुहानी ।।
आए—– मेघा,
लाए——मेहा,
टूट के बरसा पानी।।
श्रीमती विनोद शर्मा
धामपुर




