साहित्य

आए मेघा

श्रीमती विनोद शर्मा 

आए—- मेघा,

लाए—– मेहा,

टूट के बरसा पानी।

नेह ——–लुटाए,

जग—— हर्षाए,

गगन घटा घहरानी।।

 

श्वेत श्याम से,

घन प्रकाम से

घिर घिर बदरा आनी।

घनन घनन घन

मेघा —– गर्जन ,

विचर रहे मनमानी।।

टप टप टप टप

छपछ्प छपछप

जल ही जल लहरानी।

मेघा —–आए,

मेहा—–लाए,

टूट के बरसा पानी।।

 

सखी सयानी,

बरखा–आनी,

धरा हुलस उमगानी।

कहाँ— उठाऊँ ,

कहाँ—बिठाऊं

करूं कैसे अगवानी?

आयी—–द्वारे,

बाँह —–पसारे,

गले लग लग मुस्कानी।।

आए —–मेघा,

लाए—–मेहा

टूट के बरसा पानी।

 

हरे भरे —–से,

धुले पात—-से

झूमें वन थिरकानी।

ताल— तलैया,

पोखर– — कुईया,

जल पूरित अभिमानी।

सब —- – नद नाले,

हुए—— कुचाले

तटनी तट अवमानी।।

आए ——मेघा,

लाए——मेहा,

टूट के बरसा पानी।

 

अंक शायिनी

चपल दामिनी,

तड़ित रेख चमकानी।

कड़क कड़क कर ,

अट्टहास — – कर,

वारिद हुए अभिमानी ।

देख —- तुम्हारा,

रौद्र —– प्रहारा ,

अंतर भीत जगानी।।

 

घटा —–घनेरी,

रैन —- अंधेरी ,

महल आन बरसानी।

भीगे——सारी

मन —-फुलवारी ,

राग सुरीला गानी।

नव—– स्पंदन ,

मधुरिम– मंथन,

लागे सेज सुहानी ।।

आए—– मेघा,

लाए——मेहा,

टूट के बरसा पानी।।

 

श्रीमती विनोद शर्मा

धामपुर

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