
जो आजीवन शब्दों से पुल बनाता रहे…प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ : एक युग का मौन
कछ लोग अपने समय में चर्चित होते हैं, कुछ समय के साथ और बड़े होते जाते हैं। प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ दूसरी श्रेणी के साहित्यकार थे। वे मंचों की चमक से नहीं, अपनी अध्ययन-निष्ठा और शब्द-साधना के प्रकाश से पहचाने जाते थे। उन्होंने कभी स्वयं को स्थापित करने का कोई प्रयत्न नहीं किया। उन्होंने केवल साहित्य को स्थापित करने का प्रयत्न किया। शायद इसी कारण उनका व्यक्तित्व जितना शांत था, उनका कृतित्व उतना ही विराट।
25 जुलाई 2026 को उनकी प्रथम पुण्यतिथि है। संयोग देखिए कि यदि नियति ने कुछ और समय दिया होता तो यह उनका जन्मशती वर्ष भी होता। समय ने उनकी आयु भले एक वर्ष कम कर दी, पर उनके शब्दों की आयु नहीं घटा सका। साहित्य में जीवित रहने के लिए सौ वर्ष जीना आवश्यक नहीं, सौ वर्षों तक पढ़ा जाना आवश्यक होता है और ‘विदग्ध’ जी का साहित्य इसी दीर्घजीविता का अधिकारी है।
उनका जीवन किसी घोषणापत्र की तरह नहीं, एक शांत नदी की तरह बहा। सादा जीवन, उच्च विचार, यह उनके लिए कोई आदर्श वाक्य नहीं था; यह उनका स्वभाव था। वे जितने बड़े विद्वान थे, उतने ही सहज मनुष्य। तीन-तीन विषयों में स्नातकोत्तर शिक्षा, अर्थशास्त्र के अध्यापक, शिक्षाशास्त्री, कवि, अनुवादक, संपादक और चिंतक—परंतु इनमें कहीं भी अहंकार की रेखा नहीं मिलती। उनके व्यक्तित्व का सबसे बड़ा अलंकार उनकी विनम्रता थी।
उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन की पदचाप सुनी थी। औपनिवेशिक भारत देखा था, स्वतंत्र भारत का निर्माण देखा था और आधुनिक भारत की तकनीकी छलाँग भी देखी थी। घोड़े पर डाक लाने वाले डाकिये से लेकर डिजिटल युग तक की यात्रा उन्होंने केवल देखी नहीं, उसे समझा भी। इसलिए उनके साहित्य में इतिहास की स्मृति भी है और भविष्य की चिंता भी।
उनकी कविताएँ पढ़ते हुए स्पष्ट अनुभव होता है कि वे केवल शब्दों के कवि नहीं, मूल्यों के कवि थे। राष्ट्र उनके लिए राजनीतिक अवधारणा नहीं, सांस्कृतिक चेतना था। अध्यात्म उनके लिए पलायन नहीं, मनुष्य को भीतर से प्रकाशित करने वाली ऊर्जा था। उनकी प्रसिद्ध प्रार्थना “माँ वीणापाणि” में वे अपने लिए कुछ नहीं माँगते वे समूचे विश्व के लिए सद्बुद्धि, शांति और कल्याण का वरदान माँगते हैं। यही उनकी समग्र साहित्य-दृष्टि भी है। उनका काव्य मनुष्य को बड़ा बनाने का प्रयत्न करता है, केवल भावुक बनाने का नहीं।
उनकी साहित्यिक यात्रा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण आयाम उनका अनुवाद-कर्म है। उन्होंने स्वयं कहा था,”अनुवाद का काम दो भाषाओं का सेतु होता है और अनुवादक इस सेतु का निर्माणकर्ता।” यह केवल एक वाक्य नहीं, उनके समूचे अनुवाद-दर्शन का सार है। उन्होंने संस्कृत के महाग्रंथों का अनुवाद शब्दों के स्तर पर नहीं, आत्मा के स्तर पर किया। भगवद्गीता, मेघदूतम् और रघुवंशम् के उनके पद्यानुवाद इस बात का प्रमाण हैं कि वे मूल रचनाकार की संवेदना में प्रवेश कर उसे हिंदी के पाठकों तक उसी गरिमा के साथ पहुँचाना चाहते थे। वे अनुवाद को “परकाया प्रवेश” मानते थे, जहाँ अनुवादक स्वयं नहीं बोलता, मूल कवि की आत्मा बोलती है।
आज जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता और मशीन अनुवाद का युग है, तब उनका यह विचार और भी प्रासंगिक लगता है कि शब्दों का अनुवाद मशीन कर सकती है, भावों का नहीं। भावानुवाद के लिए भाषा से अधिक संवेदना, व्याकरण से अधिक संस्कृति और शब्दकोश से अधिक आत्मानुभूति चाहिए। यही कारण है कि उनके अनुवाद आज भी सहज, ग्राह्य और काव्यात्मक माने जाते हैं।
उनका साहित्य किसी एक विषय की परिधि में सीमित नहीं है। बाल साहित्य से लेकर राष्ट्रीय काव्य तक, शिक्षा से लेकर अध्यात्म तक, निबंध से लेकर संस्कृत काव्य के पद्यानुवाद तक उन्होंने लगभग प्रत्येक क्षेत्र में सार्थक लेखन किया। उनकी चालीस से अधिक पुस्तकें केवल उनकी लेखन-क्षमता का प्रमाण नहीं, बल्कि उनके अनुशासित अध्ययन और सतत साधना की साक्षी हैं।
विडंबना यह है कि इतना विपुल साहित्य होने के बाद भी उस पर अपेक्षित अकादमिक कार्य नहीं हुआ। आज आवश्यकता है कि विश्वविद्यालय और शोध संस्थान उनके साहित्य को नए परिप्रेक्ष्य में देखें। ‘प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव के साहित्य में राष्ट्रप्रेम’, ‘उनकी कविताओं में छायावादी संवेदना’, ‘उनके रचनाकर्म के आध्यात्मिक आयाम’, ‘संस्कृत से हिंदी काव्यानुवाद की उनकी पद्धति’, ‘उनके बाल साहित्य का मूल्यबोध’, ‘शिक्षा-दर्शन और सामाजिक चिंतन’ जैसे अनेक विषय गंभीर शोध की प्रतीक्षा कर रहे हैं। उनके साहित्य में शोध की संभावनाएँ जितनी व्यापक हैं, उतनी ही उपेक्षित भी।
उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे साहित्य को जीवन से अलग नहीं मानते थे। उन्होंने जो लिखा, उसे जिया। समाजसेवा की, शिक्षण को साधना बनाया, संस्थाएँ खड़ी कीं, युवाओं को दिशा दी, राष्ट्रीय संकटों में मौन दान किया और जीवन भर अध्ययन को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाए रखा। वे प्रसिद्धि के पीछे नहीं दौड़े; प्रसिद्धि स्वयं उनके पीछे चलती रही।
आज जब साहित्य का बड़ा भाग तात्कालिक चर्चाओं और क्षणिक लोकप्रियता में उलझा दिखाई देता है, तब ‘विदग्ध’ जी का जीवन हमें याद दिलाता है कि साहित्य अंततः चरित्र की साधना है। पुस्तकें लिखना पर्याप्त नहीं; अपने जीवन को भी एक ऐसी पुस्तक बनाना पड़ता है, जिसे लोग पढ़ सकें। प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ने यही किया।
उनकी प्रथम पुण्यतिथि पर उन्हें स्मरण करना केवल एक साहित्यकार को याद करना नहीं है; यह उस पीढ़ी को प्रणाम करना है जिसने शब्दों को संस्कार बनाया, साहित्य को साधना माना और ज्ञान को लोकमंगल का माध्यम समझा।
समय आगे बढ़ता रहेगा। पीढ़ियाँ बदलती रहेंगी। किंतु जब भी हिंदी साहित्य में ऐसे रचनाकारों की चर्चा होगी जिन्होंने बिना शोर किए अपनी तपस्या से साहित्य को समृद्ध किया, तब प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाएगा।
वे चले गए हैं, पर उन्होंने शब्दों का जो सेतु बनाया है, उस पर होकर आने वाली पीढ़ियाँ भारतीय ज्ञान, संस्कृति और साहित्य की उस धरोहर तक पहुँचती रहेंगी, जिसे उन्होंने अपने मौन श्रम से सुरक्षित रखा।
यही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है, और यही हमारी सबसे बड़ी विरासत।
विवेक रंजन श्रीवास्तव



