
भाग–2 : मुस्कुराहटों के पीछे*
“बाबूजी… मैं आ गई…”
यह सुनते ही पिता की सूनी आँखों में जैसे बरसों बाद उजाला उतर आया।
उन्होंने काँपते हाथ आगे बढ़ाए। बेटी झुककर उनके चरणों से लिपट गई। दोनों की आँखों से बहते आँसू वर्षों का हिसाब चुकाने लगे।
कुछ देर तक घर में कोई शब्द नहीं बोला।
केवल सिसकियाँ थीं…
और उन सिसकियों में छिपे थे बरसों के अधूरे संवाद।
पिता ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए धीमे से पूछा—
“बेटी… खुश तो है न?”
वह एक पल को ठिठकी…
फिर होंठों पर मुस्कान ले आई।
वही मुस्कान…
जिसे वह बरसों से अपने आँसुओं पर ओढ़ती चली आ रही थी।
धीरे से बोली—
“हाँ बाबूजी… बहुत खुश हूँ।”
पिता मुस्कुरा तो दिए…
पर बेटी की आँखें पढ़ने में उनसे कभी भूल नहीं हुई थी।
उन्होंने देखा—
मुस्कान होंठों पर थी,
पर आँखों में उजाला नहीं था।
चेहरे पर सिंदूर का रंग था,
पर मन का रंग जैसे कहीं खो गया था।
माँ रसोई के द्वार से उसे देखती रहीं।
उन्होंने कुछ पूछा नहीं।
माएँ अक्सर प्रश्न नहीं करतीं…
वे मौन भी पढ़ लेती हैं।
रात को जब सब सो गए, तब बेटी अपने पुराने कमरे में गई।
अलमारी खोली…
एक गुड़िया अब भी वहीं रखी थी।
राखी का एक सूखा धागा अब भी किताब के बीच दबा था।
पुरानी कॉपी के पहले पन्ने पर बचपन की लिखावट थी—
“मैं कभी बाबुल को छोड़कर नहीं जाऊँगी…”
यह पढ़ते ही उसकी पलकों का बाँध टूट गया।
वह ज़मीन पर बैठ गई।
दोनों हाथों से चेहरा ढँक लिया।
आज पहली बार वह खुलकर रो रही थी…
क्योंकि आज वह अपने घर में थी।
बाहर आँगन में बैठे पिता आसमान की ओर देख रहे थे।
उन्हें समझ आ गया था—
बेटी मुस्कुराकर लौटी है… लेकिन उसकी मुस्कुराहट के पीछे कोई गहरा दुःख छिपा है।
वह दुःख क्या था…
यह अभी किसी ने नहीं पूछा।
क्योंकि कुछ घाव ऐसे होते हैं,
जो शब्दों से नहीं,
विश्वास से खुलते हैं…
*शेष अगले भाग में…*
दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’
जनपद संभल, उत्तर प्रदेश




