साहित्य

विषय पर्यावरण

विनीता चौरासिया

जलधार नहीं बहती,

ये सूखी नदियाँ

पीड़ा को है कहती ।

 

राहों से हटते हैं,

पादप भी रोते

जब-जब ये कटते हैं ।

 

भू जल को है तरसे,

जलद कहाँ हैं वो

अमृत से जो बरसे।

 

पग पथ पर हैं जलते,

जीव वो कितने ही

तरु- छाया में पलते ।

 

ये जाल पुलों का है,

ध्वस्त हुई बगिया

बस ख्वाब गुलों का है ।

 

नहीं मिलती शुद्ध हवा,

पर्यावरण दूषित

विटप ही असली दवा ।

 

ना छाया मिलती है,

तपती धरणी पर

यह काया जलती है ।

 

मेघ भी झुकते नहीं,

वृक्ष नहीं हैं तो

वर्षा को रुकते नहीं ।

 

विनीता चौरासिया शाहजहाँपुर उत्तर प्रदेश

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