
जलधार नहीं बहती,
ये सूखी नदियाँ
पीड़ा को है कहती ।
राहों से हटते हैं,
पादप भी रोते
जब-जब ये कटते हैं ।
भू जल को है तरसे,
जलद कहाँ हैं वो
अमृत से जो बरसे।
पग पथ पर हैं जलते,
जीव वो कितने ही
तरु- छाया में पलते ।
ये जाल पुलों का है,
ध्वस्त हुई बगिया
बस ख्वाब गुलों का है ।
नहीं मिलती शुद्ध हवा,
पर्यावरण दूषित
विटप ही असली दवा ।
ना छाया मिलती है,
तपती धरणी पर
यह काया जलती है ।
मेघ भी झुकते नहीं,
वृक्ष नहीं हैं तो
वर्षा को रुकते नहीं ।
विनीता चौरासिया शाहजहाँपुर उत्तर प्रदेश


