
बचपम लौट आया एक घंटे के लिए
ये देखकर खिलौने खोज लाऊँगी,
पड़े होंगे कहीं पे,वो पहिया चलो घूमें गली में।
दबे होंगे कहीं पे, वो कंचे खोद लाऊंगी,
वो गिल्ली, कहीं पे खो गयी है, उठा लाऊंगी।
वो बचपन लौट आया,कहीं जो खो गया था,
या फिर छुप कर कहीं पे, मुँह ढककर सो गया था।
ना कोई चिंता, ना कोई फिक्र,
बस अपनी धुन में मगन रहते थे हम।
बचपन वही तो है जहाँ हम,
किताबों का बोझ,मुर्गा बनना।
रोज होमवर्क न करना, स्कूल
में शिक्षक और घर की डाँट सुनना ,
बडों की आज्ञा लेना, कभी-
कभी मार भी खाना।
हर कोई पूछेगा,क्या बनोगे बड़े होकर,
दूसरे कहेंगे,डॉक्टर,इन्जीनियर,
नेता, पुलिस या शिक्षक और पता
नही क्या- क्या मैं हंस कुछ भी बोल दूंगी।
झूट बोलते थे पर, फिर भी कितने सच्चे थे हम,
ये उन दिनों की बात है बच्चे थे हम।
काश वो बचपन कभी न लौट के जाये,
फिर पाँव से धूल उड़ाये हम।
चुपचाप से अपनी मस्ती में,
पूरा समय धूम मचा देंगे हम।
बचपन की यादों को ताजा करेगे हम,
पापा संग घूमने जाएंगे हम
ये मेरा बचपन की बातों को
करके खूब मुस्करेंगे हम।
स्वरचित और मौलिक
संगीता वर्मा,
कानपुर उत्तर प्रदेश




