
कौन नापता है पाँव के छाले का फ़ासला,
जिन्हें दरिया से मिलना हो, वो किनारे नहीं गिनते।
लहू की आग में जब हौंसला परवान चढ़ता है,
हवा के रुख़ से फ़िर रास्ते कभी पूछा नहीं करते।
सुना है राह में सदियों के सन्नाटे डराते हैं,
कि हर इक मोड़ पर कोई मुसाफ़िर टूट जाता है।
मग़र जो बुझने न दे सीने में अपनी तपन की लौ,
वो अंधेरे को भी अपना रहनुमा कर जाता है।
जिसे मन्ज़िल की धुन हो, वो कभी रुका नहीं करते,
चट्टानों को चीरकर अपनी ही राह बनाते हैं।
-डॉ. दक्षा जोशी’निर्झरा’
अहमदाबाद, गुजरात।




