
मित्रता वहीं जो थी,कृष्णा-सुदामा बीच
चाहें कोसों दूर हो, फिर भी लाये खींच
कृष्ण-सुदामा मित्रता सबको देती ज्ञान
न भूलों कभी मित्र को, रखों सदैव ध्यान
मित्रता में न कोई दरिद्र, न ही है धनवान
सच्चा मित्र पाता जो,वहीं सबसे धनवान
सुना कृष्ण ने जब, सुदामा आये हैं द्वार
शीघ्र उठे मिलन को, पहुचें महल द्वार
हुए आनंदित, अश्रु कमलनयन में आए
छुआ न जल, चरण नयन जल से धोए
जिनकी ये सम्पूर्ण जगत करता आरती
वें स्वयं उतारें, मित्र सुदामा की आरती
गले लगा कृष्ण ने, जताया प्रेमाधिकार
किया सुदामा मित्र का,पूर्णरूप सत्कार
मीनाक्षी शर्मा ‘मनुश्री’




