साहित्य

हमारी प्रथम गुरु माँ

शशि कांत श्रीवास्तव 

माँ ही जीवन की पहली गुरु होती है

उससे ही जीवन की हर सीख मिली,

उसकी ममता की शीतल छाया में,

हर राह में हमको शक्ति मिली,

उसने ही उँगली पकड़ चलना सिखलाया,

गिर -गिरकर फिर से उठना बतालाया,.

सदा सच की राह पर बढ़ते जाना,

हर कठिनाई से लड़ना सिखालाया,

अपने सुख को त्यागकर जिसने,

भर दिए हैं जीवन में नया परिवेश,

माँ का आँचल है ज्ञान का सागर,

और,उसका प्रेम है अमृत की धारा,

ईश्वर का है अनुपम उपहार,

माँ का स्नेह, और माँ का दुलार,

प्रथम गुरु को शत-शत वंदन,

यही है जीवन का सच्चा आधार ||

 

शशि कांत श्रीवास्तव

डेराबस्सी मोहाली, पंजाब

स्वरचित मौलिक रचना

29-07-2026

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