साहित्य

सावन का संगीत

ममता झा

रिमझिम बूँदों की सरगम है,

धरती गाती मधुर गीत।

हरियाली की चूनर ओढ़े,

सज उठता जग अति पुनीत।

 

मोर पंख फैलाकर नाचे,

कोयल छेड़े मधुर तान।

पुरवाई के कोमल झोंके,

भर देते नव जीवन-प्राण।

 

कदंब तले झूले पड़ते,

हँसती सखियाँ गाएँ मल्हार।

मेघों की मृदु गूँज सुनाकर,

झूम उठे सारा संसार।

 

शिवालय में गूँजे “बम-बम”,

भक्ति बने मन की झंकार।

बेल-पत्र, गंगाजल अर्पित,

शिव बरसाएँ सुख अपार।

 

सावन केवल ऋतु नहीं है,

प्रेम, प्रकृति का मधुर विधान।

इसके सुर में जो खो जाए,

महक उठे उसका जीवन-गान।

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ममता झा मेधा

डालटेनगंज

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