साहित्य

बचपन का घर”

सुषमा श्रीवास्तव 

आज यह👆 चित्र देखकर मुझे मेरा बचपन का घर याद आ गया। चलिए, चलते हैं वहाँ —

 

अहा,कितना प्यारा होता है बचपन का घर!

जिसमें मैंने अपना

बचपन बिताया,

वो घर आज भी याद है।

 

“वो खिड़की से झाँक झाँक कर

मूँगफली वाले को बुलाना,

वो घर आज भी याद है।

अपना बिस्तर वाला पलंग

आज भी याद है।

देखा मैंने जाकर वो घर,

कई सालों के बाद…

उस घर की हर दीवार पर

अम्मा-बाबू की वो डांँट और प्यार,

आज भी याद है।

सच है हम जहान में

कहीं भी चले जाएँ,

पर बचपन की हर बात,

और जन्म से जहाँ-जहाँ रहे,

वो शरारतों से और मस्ती का घर,

सांस रहते तक हमें

सदा ही याद रहते हैं।

भले वो कच्ची

झोपड़ी या आलीशान

महल ही क्यों ना हो,

पर वो बचपन बिताया घर

मुझे आज भी याद है,

उस घर से जुड़ी यादें,

कितनी सुंदर, कितनी प्यारी,

दुनिया की हर यादों से न्यारी।।

रिश्तों को सहेजता,ममता के माणिकों से गुँथा,

होता अद्भुत अपना घर।।

रचयिता –

सुषमा श्रीवास्तव

मौलिक कृति

सर्वाधिकार सुरक्षित , रूद्रपुर, ऊधम सिंह नगर, उत्तराखंड

31-07-26

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