
जैसे दूध अरु नीर मिलत है वैसे ही मिलते ।
अगर दूध में दाहकता हो पहले जल जलते ।।
पीर जो समझे अपनी ही ।।
मित्रता कृष्ण सुदामा सी।।
राम ,सुग्रीव ,विभीषण , निषाद को गले लगाते ।
मित्र सुह्रदय अभिन्न होत हैं ये संत शास्त्र गाते ।।
संगति से हो विपत नासी ।
मित्रता कृष्ण सुदामा सी।।
धीरज धर्म मित्र अरु पत्नी आपत्ति के संगी ।
सदा साथ दें यदि आ जाये कोई भी तंगी ।।
दोस्ती होय बहुत सांसी ।
मित्रता कृष्ण सुदामा सी।।
अपने दुख से अधिक मित्र के दुख को जो समझे ।
अपनादुख लघु मित्र के दुख को बहुत बड़ा समझे ।।
मित्रता होती वही खासी ।
मित्रता कृष्ण सुदामा सी।।
मक्खन सा मन करना लेकिन धोखा नहीं देना।
देना देना सीख दोस्त तुझे न पड़े कभी लेना ।।
विपत्ति कृष्ण कृपा नासी।
मित्रता कृष्ण सुदामा सी।।
डा राजेश तिवारी मक्खन
झांसी उ प्र




