
*क्षणिकाएंँ*
हबस के पुजारी
फेंकते हैं प्रेमजाल का पासा
करते हैं निरंतर प्रयास
यही सोचकर कि
एक-न-एक दिन तो पूरण होगी आस ।१।
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विपक्षी पार्टियाँ सब मिलकर
कुतर्क से जनता को समझा रही हैं
सरकार की हर बात में बाल की खाल गिना रही हैं
जनता हमारे झाँसे में आ जाए
फिर एक-न-एक दिन
हमारी भी सरकार आए ।२।
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पढ़-लिख कर रोजी-रोटी होगी मेरे हाथ
एक-न-एक दिन
मेरे घर के भी बदलेंगे हालात
पर जो भी वह परीक्षा दे रहा है
उसी का पेपर आउट हो रहा है ।३।
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पढ़-लिख कर
नौकरी की कर रहा हूँ तलाश
व्यापार के लिए पैसा नहीं है पास
जब तक नौकरी नहीं तब तक छोकरी नहीं
एक-न-एक दिन दोनों होंगी पास
जी रहा हूँ उदासी में लिए यही आस ।४।
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भू-माफियों और लुटेरों की है यह आवाज
कितना जुल्म ढहा रही है सरकार
हड़पी हुई जमीनें हो रही हैं खाली
जिन पर कुंडली मारे बैठे थे मवाली
वह भी इसी आस में जी रहे हैं
एक-न-एक दिन आयेगी उनकी सरकार
तब करेंगे तकरार
यह नहीं समझ रहे हैं कि अब उनके ही दिन फिरे हैं
जिनके घरवालों के दिल
उनके ही सामने चिरे हैं ।५।
*-राम किशोर वर्मा*




