
जीवन यूँ ही बेकार गया,
रेत की माफ़िक ढल गया,
हर सुबह एक शाम ले आया,
हर चाहत कहीं खो गया।
कलियाँ मुरझाईं बिना खिले,
नदियाँ सूखीं बिना बहके,
सपने टूटे बिना सजे,
राहें रुकीं बिना चले।
उम्मीदों के दीए बुझे,
जिंदगी के रंग ढहे,
आँखों में बस अँधेरा रहा,
दिल की हर धड़कन थमी।
मगर इस राख में दबे हैं अभी,
कुछ चिंगारी के कण,
शायद अभी बाकी है,
मेरी कहानी का अंत।
डॉ सुरेश जांगडा
राजकीय महाविद्यालय सांपला, रोहतक (हरियाणा)




