
कल यादों का पिटारा खुला,
कुछ पुरानी तस्वीरें हाथों में आईं।
बोलती, चहकती, स्नेह से महकती तस्वीरें—
हंसती, छेड़ती, शरारत करती तस्वीरें।
उन्हें देखकर मन भी मुस्कुरा उठा,
बीते दिनों की खुशबू फिर से पास चली आई।
जैसे कोई सुनहरा सपना हो—
सब कुछ कितना अपना-अपना सा दिखाई पड़ा।
पर फिर मन में एक टीस उठी—
क्यों आज रिश्तों में इतनी दूरी है?
क्यों वही चेहरे दिल में चुभन-से भर देते हैं?
क्या कुछ गलत हुआ हमारे साथ?
या कुछ गलती हमसे भी हुई…
इसी उलझन में साल बीत गए।
शायद गलतफहमियों की धूल जमी,
शायद अहंकार की ठंड ने दिलों को जमा दिया।
ना उन्होंने हमें समझा,
ना हमने उन्हें समझा—
ना कहने की ज़रूरत समझी,
ना सुनने का धैर्य रखा।
यादें धुंध में ढँकती रहीं,
बातें अधूरी ही रह गईं।
रिश्ते नाम भर के रह गए—
और फासले बढ़ते चले गए।
फिर सवाल उठता है—
जब इतनी ही दूरी रखनी है,
तो हम क्यों नहीं फेंक देते यह यादों का पिटारा?
क्यों नहीं आज़ाद कर देते खुद को
मोह के उस बंधन से… जो बस चुभता ही रहता है?
शायद इसलिए…
क्योंकि दिल के किसी कोने में आज भी
एक उम्मीद का छोटा-सा बीज
कुछ बूंदें स्नेह की खोज रहा है।
एल्बम में मुस्कुराहटें आज भी जस की तस हैं—
पर जीवन के पन्नों पर
वही मुस्कुराहटें बिखरी-बिखरी सी नज़र आती हैं।
ज्योती कुमारी
नवादा (बिहार)



