साहित्य

माॅ और ममता

रविशंकर शुक्ल

“माँ”
महाभारत का
एक प्रसंग है
कुन्ती के द्वारा
पांडवों को कर्ण के
सहोदर भाई
बताये जाने के बाद
युधिष्ठिर ने कहा ……
जंग के मैदान में
जब कर्ण तीखा प्रहार करते हुए
हम सभी को जली कटी
सुनाते तो मुझे
भयंकर गुस्सा आता
पर अचानक
जब मेरी दृष्टि उनके
पैरों की तरफ जाती
मेरा गुस्सा
एकदम शांत हो जाता
क्योंकि उनके पैर
मेरी माँ के पैरों से
हूबहू मिलते थे।

“माँ का दर्शन “

कितना सुन्दर यह चरण-रज
कितना पावन है यह धूल
इससे बड़ा कोई न देवता
पहने ढेर सा माला-फूल
नहीं जा रहा मै वृंदावन
ना ही मैं मथुरा या काशी
मैं तो माँ का भक्त पुजारी
बस ममता का ही अभिलाषी
दर्शन माँ का अवश्य करूँगा
गया हूँ मैं इस बात पर तूल
नष्टप्राय हो जाये हृदय से
बने हुए दुख दर्द के शूल
नहीं जा रहा मै चारो धाम
कोई नही हूँ मैं सन्यासी
मैं तो माँ-मंदिर का पुजारी
दर्शन हित ये आँखें प्यासी।

” चरण रज “
माँ होती श्रद्धा का रूप
कोई ना ऐसा है अनूप
गदगद हुआ,प्रफुल्लित होकर
मैं गर्वित भी हूँ स्वयं भाग्य पर
निश्चिंत हूँ कार्य शुभारंभ कर
चरण रज, माथे से लगाकर
माँ के आँचल की है छाया
मैं तो सदैव निश्चिंत सोया
मेरे कदम हमेशा अग्रसर
चौकसी के साथ-साथ पर
कहीं किसी भी शुरूआत पर
चरण रज, माथे से लगाकर
जब भी लगाया सिर से धूल
हुई ना मुझसे कोई भूल
मैं खो जाता जब चिंता कर
तो तत्काल माँ पास आकर
सांत्वना देती हाथ फिरा कर
चरण रज माथे से लगाकर
माँ है क्षमा-दया का रूप
ऐसा नहीं स्वयं जगद् रूप
गुस्से में मै सो जाता जाकर
तब चिंतित माँ तुरंत ही आकर
आती मेरा भोजन लेकर
चरण रज माथे से लगाकर
माँ होती ममता की मूरत
दिखी न कोई ऐसी सूरत
आता बचपन में गलती कर
खड़ी रहती माँ डंडा लेकर
पर छोड़ देती सिर्फ डांट कर
चरण रज माथे से लगाकर
माँ का ऐसा प्यार-दुलार
इसका कोई न पाये पार
जब माँ मारती मुझको आकर
तब,रोता था खूब सिसक कर
पुचकारती तब दूध पिला कर
चरण रज माथे से लगाकर
पुत्र होता माँ का सदा ऋणी
माँ है सब दुखों की हरणी
थपकी देकर,मुझे सुला कर
उढ़ाती बड़े प्यार से चादर
खुश होता मन में ही गुनकर
चरण रज माथे से लगाकर।

लघुकथा

“ममता”

यह संभवतः सन् 2003 की बात है। मैं लगभग बीस दिनों के लिए रायबरेली से अपने गाँव करायल शुक्ल गया था,जो देवरिया जिले के अन्तर्गत है। नवम्बर आधा बीत चुका था और ठंड की शुरुआत खासकर सायं काल से लेकर सुबह तक के लिए हो चुकी थी। मेरी माँ, छै महीने या साल भर के लिए रायबरेली आती थीं पर अधिकतर गाँव में ही रहती थीं।घर पहुँचने के पश्चात अगले दिन रात के करीब दस बजे उन्होंने पूछा ‘बाबू! चाय पियोगे’ मैंने बोला
‘नहीँ अम्मा’।यही बात उन्होंने अगले दो दिन भी पूछी और प्रत्युत्तर में मैंने नकारात्मक उत्तर दिया। पर माँ को यह पता था कि रायबरेली में खाना खाने के बाद भी रात मे मैं चाय पीता हूँ, तीसरे दिन के नकारात्मक उत्तर के बाद माँ ने चुपके से चाय बनाकर शाम को ही रख लिया, फिर पूछीं बाबू! चाय पियोगे?,मैंने पहले ही बना कर रख लिया है केवल गर्म करना है। इस तर्क और उनकी ममता के आगे मैं नतमस्तक था, अतः मैंने कहा लाइये अम्मा! पी लूँगा।

रविशंकर शुक्ल

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