साहित्य

सीख… बाल-कहानी

जयचन्द प्रजापति 'जय'

एक बार की बात है, एक हँसमुख किसान अंकल का बड़ा सा खरबूजा का खेत था। खेत हरा-भरा था, और खरबूजे चमचमाते सूरज की तरह गोल-गोल लाल हो रहे थे। किसान अंकल हर रोज़ खेत की रखवाली करते।

एक दिन दो शरारती गधे, रामू और श्यामू, जंगल से घूमते-घूमते खेत में घुस गए। रामू ने बड़े-बड़े खरबूजे देखे तो लालच में आ गया। “अरे वाह! कितने मीठे लग रहे हैं!” कहकर उसने एक खरबूजा काट खाया। श्यामू ने भी दो-तीन खरबूजे चट कर डाले। दोनों मज़े से खाते रहे।

अचानक किसान अंकल आ गए। उन्होंने रामू-श्यामू को पकड़ लिया। रामू घबरा गया। उसने सिर झुकाकर कहा, “अंकल जी, माफ़ी! हम गलती से आ गए। दोबारा कभी नहीं आएँगे।” किसान अंकल मुस्कुराए और रामू को छोड़ दिया।

लेकिन श्यामू ने नाक सिकोड़ी और बोला, “मैं तो कुछ नहीं करूँगा! माफ़ी क्यों माँगूँ?” किसान अंकल नाराज़ हो गए। उन्होंने श्यामू को पन्द्रह डंडे मारे। श्यामू दर्द से चिल्लाया, “आह! अब कभी नहीं आऊँगा!”रामू-श्यामू घर लौटे।

किसान अंकल ने चेतावनी दी, “दोबारा खेत में आए तो कड़ी सजा मिलेगी! गलती हो जाए तो सच्चे दिल से माफ़ी माँग लेना चाहिए।”उस दिन से रामू-श्यामू ने सीख ली – गलती मानकर माफ़ी माँगने से दोस्ती बनी रहती है!

जयचन्द प्रजापति ‘जय’
प्रयागराज, यूपी

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