साहित्य

ग़ज़ल

कनक

इस जमाने में हमारे ग़म दिलबर में नहीं
चलता जाने न वो अपने बस दिनकर में नहीं।।//१//

जीते हैं सब कुछ अपनी ही मर्जी से हमेशा
देखो दुनियां में भी कोई अब तेवर में नहीं।।//२//

कोई पूछे दिल का हाल भी मेरे लिए है
सनम आजा अब दुनियां में भी जोकर में नहीं।।//३//

चार दिन का है ये जीवन ख़ुद जी ले यहां तक
दुनियां भी बहुत बड़ी है अब लश्कर में नहीं।।//४//

बात आखिर कुछ भी दिल में वो समझाने जाते
जीता हूं मैं ख़ुद अपनी पर मुजतर में नहीं।।//५//

ताज़मीन

कौन चाकर है वो अपने मन के बादशा है
मुंह से निकली हैं सितमगर के घड़ी भर में नहीं।।//६//

मकता

समझता हूं सबको ही दुनियां में कनक मैं
आजकल इस दुनियां में कोई पत्थर में नहीं।।

कनक

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