
इस जमाने में हमारे ग़म दिलबर में नहीं
चलता जाने न वो अपने बस दिनकर में नहीं।।//१//
जीते हैं सब कुछ अपनी ही मर्जी से हमेशा
देखो दुनियां में भी कोई अब तेवर में नहीं।।//२//
कोई पूछे दिल का हाल भी मेरे लिए है
सनम आजा अब दुनियां में भी जोकर में नहीं।।//३//
चार दिन का है ये जीवन ख़ुद जी ले यहां तक
दुनियां भी बहुत बड़ी है अब लश्कर में नहीं।।//४//
बात आखिर कुछ भी दिल में वो समझाने जाते
जीता हूं मैं ख़ुद अपनी पर मुजतर में नहीं।।//५//
ताज़मीन
कौन चाकर है वो अपने मन के बादशा है
मुंह से निकली हैं सितमगर के घड़ी भर में नहीं।।//६//
मकता
समझता हूं सबको ही दुनियां में कनक मैं
आजकल इस दुनियां में कोई पत्थर में नहीं।।
कनक




