साहित्य

व्यंग्य:- चाय ने आज तक किसी को नहीं रुलाया सो चाय पिया करते हैं..

मदन वर्मा " माणिक "

व्यंग्य:- चाय ने आज तक किसी को नहीं रुलाया सो चाय पिया करते हैं..
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ना ये पंक्तियां ना शेर और ना ही शायरी बस ये तो हमारा प्रेम है इससे इसलिए कह लो इसे प्यारी चायरी। किसी को हक नहीं हमारे सिवाय जो कहकर देखें, ओ मेरी_ओ मेरी प्यारी सी चायरी। इसे पीने दें और हमें इसे मुंह से चुस्की लेकर हलक
तक उतारना है। ठंडी देखी नवंबर – दिसंबर की। चाय ही हमारा
संबल थी आज भी हैं जोरदार तलब इसकी, आगे कभी खत्म नहीं होगी। गुस्सा हो जाता मैं जो कभी कहते। चाय छोड़ क्यों नहीं देते। इस जुमले को पचा नहीं पाता। प्रेम-मोहब्बत के इस
बेगाने सेतु को बख्श क्यों नहीं देते मेरी प्यारी चाय के ये दुश्मन।
ठंड में जैसे बिस्तर-रजाई चाहिए, मन बहलाने को, चाय भरी
प्याली चाहिए फिर…..सुड़क-सुड़क……लगाते रहो मनपसंद मीठी और मसाले वाली चाय की अपनत्व भरी सुड़की।

यहां तो ना आह ना वाह पहले हाथ में दो चाय वह भी बड़ा सा
मग भर दो, तन मन जगमग कर दो। भिया चाय तो गर्मागर्म ही
देनी चाहिए आपको और हमें भी बड़े प्रेम-स्नेह से इसे बार-बार सुड़की ले लेकर पीना चाहिए तभी तो मजा आएगा, प्राणप्यारी
चाय का वाह चायरी, हाय री। ठंडी में चाय ना मिले तो सबकुछ सूना है चाहे दिन हो या रात, चाय की बेताबी से भरा इंतजार,
जब भी चाय बनने की सुगंध महकें, चाय के बर्तन, प्याली, मग
चहकें, जिया धड़के-मन फिसल-फिसल जाए। जैसी भी होती है
चाय की खुमारी सारी झटपट उतर जाये। गाढ़ी ठंड, हाथ – पांव
पड़े ठंडे हुए मरियल और गजब की सुस्ती भरी तनबदन, थकान के मारे भरी थुरथुराहट, भरी कंपकंपी तो चाय बनवाकर पीलें, देर ना करें अभी। हाय री, गर्म चाय पीकर तुम भी गाओगे, चायरी।

किसी ने चाय का नहीं पूछा ठंड में तो कंजूस, पानी कौन पीता
इस कड़कड़ाती ठंड में, कम से कम पानी पिलाने के बहाने घर में
हो जाती इंट्री, फिर पूछ लेते चाय पीओगे क्या, ये भी हमारे धन्य भाग होते फिर बन जाती हमारी भी डाक्यूमेंट्री। ठंड में या कह लो सर्दी के इस मौसम में गर्मागर्म चाय ही सभी घर में चर्चा में वायरल है। इसका सिर्फ एक ही हल है, जो मांगें उसे चाय पिला दो और जो ना मांगें उसे जबरन चाय पिला दो। वो शख्स मना नहीं कर पाएगा। सही मायने में नहीं पीता होगा चाय तो अगले
कुछ दिनों तक आपके घर आपसे मिलने नहीं आएगा। अब
नया दौर चलाइये जो चाय पिने पिलाने का हो जाएगा, हर जगह
चाय ही बिकेगी। विज्ञापनों में गर्मागर्म स्वादिष्ट चाय ही टिकेगी।
खूब भरपल्ले चलेगा ये व्यापार हम चाहे हों इंडोर या आउटडोर
वंश मोर फिर चलेंगे घर किसी के या रेस्टोरेंट सबको मालूम है यह, जीवन में कुछ भी नहीं परमानेंट तो भैये, चाय पीओ मनपसंद स्वाद वाली जिससे चुस्ती-फुर्ती आएं भरपूर।

चाय ने आज तक किसी को नहीं रुलाया सो चाय पिया करते हैं।
यह आदत बनी हुई है शुरू से आज तक जारी है हम पीने से किसी को मना नहीं करते। पिलाने से भी परहेज नहीं है। चाय तो प्रेम का सेतु है। दोस्तों से मिलना एवं संवाद निरंतरता बनाए रखना यह मेलजोल बढ़ाने का बहाना हैं जब हम कहते हैं आओ साथ बैठेंगे,
चाय पीने आना है। चाय नहीं होती तो इतनी बैठकें कैसे सफल होती। चाय की मिठास में व्यवहार भी नरम हो जाते हैं। उलझे मसले आसान हो जाते, व्यवहार की तल्खियां दूर हो जाती। चाय से वाह-वाह ज्यादा होती है। हंसी मजाक भरी बैठकें हो जाती हैं,
चाय आपसी कडुवाहट खत्म कर वातावरण में मिठास घोलती है।
फिर कहूंगा मैं चाय ने आज तक किसी को नहीं रुलाया सो चाय पिया करते हैं..। यही आदत हमारी है, हमारे देश में जिंदादिली और ताजगी मिलती हैं तो चाय पर होने वाले सौहार्दपूर्ण बैठकों में भरी चाय की प्याली से मिले मिठास से मिलती हैं।

– मदन वर्मा ” माणिक ”
इंदौर , मध्यप्रदेश

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