
जले चरागों सी जिन्दगी।
मिले रोशनी सी जिन्दगी।
हादसों में क्यों गंवायें हम,
मुक्तसर सी यह ज़िन्दगी।
फूल खुशबू सरीखी लगे,
हमको महकती ज़िन्दगी।
नफ़रतों के दौर में भी यह,
रहे कैसे चहकती ज़िन्दगी।
ग़म की मारी भी रही हरदम,
घटाओं सी छलकती जिन्दगी।
आइना बोलेगा न फिर – फिर,
यह दरकती सी लगे ज़िन्दगी।
किसमें कितनी बेरुखी हो ही गई,
देखती है यह भटकती ज़िन्दगी।
चाहतों की एक दुनिया आ बसी,
बस उसी में है फिसलती ज़िन्दगी।
वाई.वेद प्रकाश
द्वारा विद्या रमण फाउंडेशन
शंकर नगर, मुराई बाग, डलमऊ, रायबरेली उत्तर प्रदेश 229207
9670040890




