साहित्य

आज़ाद नहीं है

जगदीश कुमार धुर्वे

आजाद हूँ मगर रूह आज़ाद नहीं है,
चलता तो हूँ पर मेरी उड़ान आज़ाद नहीं है।

बचपन में सीखी थी बातें आज़ादी की,
समझ आया बाद में—हर पहचान आज़ाद नहीं है।

दिखते नहीं हैं बंधन, फिर भी बँधे हैं हम,
हर इक ख़याल, हर एक अरमान आज़ाद नहीं है।

ख़ुद को ही खोल सकूँ, इतनी ताक़त कहाँ,
मन की इस क़ैद से हर इंसान आज़ाद नहीं है।

जो मोह, भय और अहं से ऊपर उठ गया,
बस वही है यहाँ—जिसकी पहचान आज़ाद नहीं है।

**जगदीश** कहे—यह संसार अनंत सही,
पर मन के बिना कोई भी इंसान आज़ाद नहीं है। (मौलिक व स्वरचित)

जगदीश कुमार धुर्वे
सुखतवा, जिला नर्मदापुरम (म.प्र.)

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