साहित्य

बादल बनकर

आकिब जावेद

बादल बनकर
समुद्र की अथाह गहराइयों से
मुझे उठा ले जाना,
और उस ऊँचाई तक पहुँचा देना
जहाँ से
जब मुझे छोड़ दिया जाए,
तो मैं
बूँद बनकर नहीं,
हिम बनकर गिरूँ।

जिस गिरने में
पीड़ा का कोई बोध न हो,
जहाँ पतन भी
स्थिरता का ही दूसरा नाम हो,
और मैं
जहाँ भी धरती को छुऊँ,
वहीं ठहर जाऊँ
न टूटूँ,न बिखरूँ,
न बहूँ,
और अंततः
बस हिम बनकर रह जाऊँ।

आकिब जावेद

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