
गजल
जब स्वार्थ घुला रहता हर नेक दुआओं में,
कैसे उजियाला हो अँधियारि घटाओं में।
सच बोल कर रह गया विश्वास न हो पाया।
शोर मच रहा था बस झूठी सि अदाओं में।
दिल हार कर गये हैं मेरी नजरों में है,
अब होश कहाँ बाकी मदहोश निगाहों में।
तुम राज छुपाते हो कुछ बात अनोखी है,
तेरे बिन जीवन सुनसान अब बहारों में।
संवाद नहीं होता मेरा मन विचलित है,
है राह सुमन देखे हर दिन गलियारों में।
डाॅ सुमन मेहरोत्रा
मुजफ्फरपुर, बिहार




