
अरावली मॉंगें रिहाई,
ना करो अब तो खुदाई।
मुझे अब बचाने फिर से,
अमृता देवी न आई।
हर दिन होते खनन से,
खोखली होती है तराई।
संकट है जीवन में मेरे,
देखो आवाज मैंने लगाई।
अरावली मॉंगें रिहाई,
ना करो अब तो खुदाई ।
अरब सागर से मैं आई,
देती हूॅं सबको दुहाई।
रक्षा करो सब मिलकर,
वीरों से पहचान है पाई।
बसे हैं शहर कईं मुझमें,
जननी उनकी मैं कहाई।
अरावली मॉंगें रिहाई,
ना करो अब तो खुदाई।
मैं जीवन देती हूॅं सबको,
रोकूं थार की चढ़ाई।
वर्षा भी करवाती हूॅं,
फिर भी मुझसे रुसवाई।
खेजड़ी बचाने को,
शहादत जिन्होंने पाई।
आखिर फिर से बने कोई,
अमृता देवी सी माई।
अरावली मॉंगें रिहाई,
ना करो अब तो खुदाई।
कवि,लेखक, गीतकार,साहित्यकार:-
धीरज कुमार शुक्ला’दर्श’
ग्राम-पिपलाज,तहसील-खानपुर,जिला-झालावाड़,राजस्थान (३२६०३८)




