
सर्द हवाएँ पूस की
कंपा रही है तन -मन ,
धुंधली होती जा रही है धूप भी
दिन ब दिन ।
बौनी हो गयीं शाम शीत की
रातें हुई लंबी ।
बाहर कितनी परछांई है
उलझन में है मन।
कोहरा जैसे धुआँ-धुँआ…
गहराया मन का कुँआ।
सनन्नाटे की बाहों में
उंगलियाँ गिन रहे हैं दिन ।
ओस के गीलेपन पर
टिकते नहीं हैं पाँव ….
सूरज भी जा बैठा है
और किसी ही गाँव।
सूने-सूने से पल छिन।
फटेहाल हो गए चिनार
किससे मांगे कुछ उधार ।
” पारा गिरता जा रहा ”
बता रहा समाचार….
आज झांक कर चली गयी हैं
सूरज की किरणे कमसिन ।
ठिठुराते हैं पूस मास के दिन ।
मंजुला शरण ‘मनु’
राँची, झारखण्ड़।




