साहित्य

छलांग जब बजरंगी लगाते

नन्द किशोर बहुखंडी

बजरंगी जब छलांग लगाए,
हृदय में प्रभु स्मरण कर के।

सागर पार पहुँच गए,
माँ सीता की खोज करने।

लंका की धरती में,
जिज्ञासा धर प्रवेश किए।

छलांग लगा अशोक वाटिका में,
माता सीता के दर्शन किए।

भूख लगी है कह माते,
आज्ञा पा फल खाए।

छलांग लगाते वृक्ष-वृक्ष पे,
तहस-नहस वाटिका किए।

देख नाश दानव दौड़े,
रावण को समाचार पहुँचाने।

बाँध कर बजरंगी को ले गए,
रावण के समक्ष प्रस्तुत करने।

रावण को बजरंगी समझाए,
सीता को सकुशल लौटा दें।

क्रोध में लंकापति आदेश दिए,
वानर की पूँछ जला दें।

प्रभु का स्मरण करके,
बजरंग छलांग लगाए।

पूरी स्वर्ण लंका भस्म किए,
वापस पुन: छलांग लगाए।

माँ सीता का समाचार दिए,
प्रभु राम का आशीष पाए।

छलांग लगाएँ प्रभु स्मरण करके,
सफलता मिलेगी प्रभु आशीष से।

हृदय में सच्चा भाव रखें,
लक्ष्य तक अवश्य पहुँचोगे।

नन्द किशोर बहुखंडी
देहरादून, उत्तराखंड

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!