
भीख मांगती
एक उम्रदराज मां से पूछा-

इस उम्र में तो
नाती-पोतो के साथ
खिलखिलाना चाहिये
घर में बने चाय पकौड़े
बहू के हाथों से लेना चाहिए
बेटा भी मां-मां पुकारता होता
आप घर में
कुछ नई-नई बात बताती होती
ऐसी दारुण-दशा देखकर
लगता है
कुछ उथल-पुथल है
नहीं-नहीं
ऐसा कुछ नहीं है
कुछ उथल-पुथल नहीं है
मन बहलाने के लिये
कुछ सुकून के लिये
यूं ही मांग रही हूं
वाह रे मां
कितनी भोली है
इतना होने पर भी
तुम सारा इल्जाम
मन से छुपा रही हो
सच में
मां सच में
तू सच है
…..
जयचन्द प्रजापति ‘जय’
प्रयागराज
कविता का भावार्थ..
यह कविता जयचंद प्रजापति ‘जय’ द्वारा रचित एक मार्मिक रचना है, जो एक वृद्ध माँ की दयनीय दशा के माध्यम से पारिवारिक विघटन, सामाजिक उपेक्षा और ममता के गहन दर्द को उजागर करती है। कविता में एक भीख मांगती बुजुर्ग माँ से कवि संवाद करता है, जहाँ वह पूछता है कि इस उम्र में तो नाती-पोतों के साथ हँसना-खिलखिलाना चाहिए, बहू के हाथों चाय-पकौड़े ग्रहण करने चाहिए, और बेटा माँ-माँ पुकारता रहना चाहिए।
माँ की यह हालत देखकर कवि को लगता है कि घर में कोई उथल-पुथल हुई है, जो संभवतः पारिवारिक कलह, बेटे की उदासीनता या घर टूटने का संकेत देती है। माँ इनकार करती है और कहती है कि मन बहलाने व सुकून के लिए भीख मांग रही है, लेकिन कवि उसकी भोलीभाली बातों के पीछे छिपे सत्य को पहचान लेता है
वह अपना सारा दोष मन पर डालकर परिवार को दोषमुक्त रखने की कोशिश कर रही है। अंत में कवि करुणा से कहता है ‘वाह रे माँ’ और ‘सच में तू सच है’, जो माँ की अपार त्यागमयी ममता, सहनशीलता और सत्यनिष्ठा को श्रद्धांजलि अर्पित करता है। कुल मिलाकर, यह कविता मातृत्व के अमर स्वरूप को चित्रित करती है, जहाँ माँ विपरीत परिस्थितियों में भी परिवार के लिए अपनी पीड़ा छिपाए रखती है, जो पाठक के हृदय को गहरे तक छू जाती है।




