
घर में दरिंदा कविता में करुणावान।
व्यक्ति दोगला क्यों होता भगवान्।।
भीतर घृणा भरी,पर बाहर मधुरता।
दोगलापन करने से वह नहीं डरता।।
बेईमान भी खुद बनता सत्यनिष्ठ।
लघुकथा लेखक कहलाता वरिष्ठ।।
निबंधकार बनता तोड़फोड़ करके।
साहित्यकार रहता इनसे डरके।।
लड़ाई-झगडे की घर की कहानी।
तानाशाही से करता मनमानी।।
साहित्य क्षेत्र में खलबली मची है।
नाक इन्हीं की बस बहुत ऊंची है।।
घर का पूरा उपन्यास बिगड़ा हुआ।
माता-पिता संग अभी झगड़ा हुआ।।
सबसे आगे पुरस्कार को लेने को।
साहित्य नाम पर कुछ नहीं देने को।।
मुझे सुनो सभी ध्यान लगाकर।
घर की शांति को आया बुझाकर।। एकांकी अभी लिखकर आया हूं।
सगे-संबंधी-मित्र को नहीं भाया हूं।।
हाईकू लिखने में मजा आता है।
हर कोई मेरा दुश्मन कहलाता है।।
मुझको सुनना मूढ़ों का भाग्य है।
लेखक बनना तो बस दुर्भाग्य है।।
लंबी-लंबी सी उबाऊ कविताएं।
गंदा नाला सी बहती सरिताएं।।
पता नहीं मुझे क्यों नहीं सुनते हैं।
जो कोई भी सुनें वो सिर धुनते हैं।।
शब्द-शब्द जोड़ तुकमारी करता।
साहित्य-पटल आ रहा उभरता।।
रस के नाम पर झलक रसहीनता।
हीर- जवाहरात में कंकड़ बीनता।।
करने लगा साहित्य का बेड़ा गर्क।
मेरे संग उच्च-कोटि साहित्य तर्क।।
मैं ही योग्य बस पुरस्कार पाने को।गर्दभ रेकन बतलाओ जमाने को।।
गधे की दुलत्ती,खच्चर खचाखच।
साहित्यिक ज्ञान उसे लगा अपच।।
किसी के रोकने से नहीं रुकेगा।
पुरस्कृत होगा ही वह नहीं बचेगा।।
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डॉ. शीलक राम आचार्य
वैदिक योगशाला




