नहीं काम आई किसी के विरासत
असंतोष फूटा हुई है बगावत l
पसीने से तर थे बदन देख सारे
हुई धूप जब तो मिली आज राहत l
अजब या गजब का मनुज का चलन है
बढ़ी देख जब से नई सी सियासत l
जमाना हमारा नवा हो रहा है
नहीं माँगता अब किसी से रियायत l
भले या बुरे का नहीं भान जिसको
वही कर रहा है सभी से अदावत l
महज चार सिक्के लगा है बचाने
समझने लगा है उसी को किफायत l
उनींदी हुई आँख जब भी हमारी
खुली छत के नीचे बिछायी बिछायत l
रामकृष्ण वि सहस्रबुद्धे
नागपुर




