साहित्य

वो खुशनुमा शाम

डॉ रामशंकर चंचल

वर्ष का अंतिम दिन
और वो खुशनुमा शाम
कैसे भूल सकते हम
कितने करीब थे हम
एक ,दूसरे को
किसी आईने की तरह
खुद को तलाशते हम
कितनी समानता लिए थे हम
याद है कितनी बेबाक

हक जता थी तुम
मुझ पर,पूरे आत्मा विश्वास से
और तुम्हारा वहीं हक जताना
चौका रहा था मुझे
कितना विश्वास है तुम्हें खुद पर
तुम्हारा यही विश्वास था
जो रास आ गया और
हम तुम एक दूसरे मैं
दूर बहुत दूर हो कर भी
सदा के लिए बस गए
एबी जब भी याद आती हैं
खुद को आईने में
देख लेता हूं
जहां तुम नज़र आती हो
इसी तरह हंसती हुई
मुझ मैं खोई हुई
तो कभी
मेरे ख्याल की
चिंता लिए
सवाल करती हुई
देखों घर से बाहर निकलो
सब से मिलों,
मैं जा रही हूं
और मैं तुम्हारे
इस सवाल पर
गुस्सा करता हुआ
बोलता हूं
जाओ रोका किसने
रही बात घर से बाहर निकलो
अब मत कहना
तुम मुझे से ज्यादा गुस्सा दिखती
रोना, मुझे बैठ कर
में तुरंत स्वीकार करता हूं
हां तुम्हें याद कर रोना मुझे
ज्यादा अच्छा लगेगा
बजाय इस स्वार्थी
राग द्वेष भरी दुनिया में
दौड़ लगाने से
तुम चुप
में भी चुप
जानते है हम दोनों
एक दूसरे को
एक दूसरे की तरह है
केवल जिस्म अलग है
आत्मा एक है

डॉ रामशंकर चंचल

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Check Also
Close
Back to top button
error: Content is protected !!