खड़े धरा पर ऊँचे पर्वत
हमको मिले विरासत में ।
सदियों से बहती नदियाँ
पर्वत से मिट्टी लाए
नदी किनारे मिट्टी से ही
उपजाऊँ मैदान बनाएं
बसे बसाए शहरों में क्यों
करता मनुज सियासत है ?
भीषणतम तूफानों से या
गिरे मेघ के ओलों से भी
खड़े अडिग रहते है पर्वत,
नदियाँ भी अविरल बहती
किन्तु किसी के सम्मुख भी
करते नहीं शिकायत है ?
कैसी यह इंसानी फ़िदरत
करते नीर प्रदूषित सारा
पर्वत तोड़ें, जंगल काटे,
पशु-पक्षी को नहीं सहारा
प्रकृति प्रदत्त विरासत की
करते नहीं हिफाजत है ।
लक्ष्मण लड़ीवाला ‘रामानुज’




