साहित्य

पर घर मे सिसकती माई हैँ

अनुज प्रताप सिंह

हर नवरात्रि शेरावाली आई हैँ,
पर घर मे सिसकती माई हैँ,

आज रिश्तो की डोर क्यों तंग हो रही,

जिसने ममता दिया उसी से जंग हो रही,
माँ पर बदला क्यों तेरा नजरिया हैँ,
घर निकाला किया ज़ब वह बुढ़िया हैँ,
आज मैया से क्यों रुसवाई हैँ,
घर मे सिसकती ये माई हैँ,

शेरावाली देख देख यह दंग हो रही,
जन्मदाता ही कटी पतंग हो रही,
दिन कटे ना कटे रात दोपहरिया हैँ
कैसे काटे जीवन की डगरिया हैँ,
क्यों मैया को मिली तन्हाई है,
घर मे क्यों सिसकती माई हैँ,

तूने कन्या खिलाई भंडारे किये,
बूढ़ी माई तेरी कितने फाके किये,
इधर भंडारे मे सब ये छकते रहे ,
उधर माँ के आँसू ना थकते रहे ,
माँ की ममता क्यों कुम्हालाई हैँ,।

घर मे सिसकती माई हैँ,
हर नवरात्री शेरावाली आई हैँ,
पर घर मे सिसकती माई हैँ।।

✍️अनुज प्रताप सिंह रायबरेली यूपी

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