
“ख्वाहिश”
उसने गैरों में रुसवा की मेरी मुहब्बत
और कहते हैं की हम बेवफ़ा निकले
जो दुआ हर रोज़ मांगी मैंने
कुबूल ना हुई वो उसके लिए
कह दी एक बात गुस्से से उसे
बद्दुआ बनकर कुबूल हो गई
समझे नही आखिर लफ्ज़ मेरे
लफ़्ज़ों से ही पहचान सके वो मुझे
बिखरे हुए जीवन की दास्तां में
टूटे हुए तारे सा मिटना है आखिर
बस यही ख्वाहिश है ‘दर्श’ की
जब सॉंस आखिरी हो
देखना है तेरी गोद में खुद को
कवि,लेखक, गीतकार,साहित्यकार:-
धीरज कुमार शुक्ला’दर्श’
ग्राम-पिपलाज,तहसील-खानपुर,
जिला-झालावाड़ ,राजस्थान (३२६०३८)




