
मैं गई थी उसे सांत्वना देने
संवेदना शिष्टाचार निभाने!
वह बताती रही, पिता के
अंतिम समय की बात!
भीगता रहा मन! लगा ऐसा,
कह रही है, मेरे ही मन की बात!
आँख बरसती रही!
मौन हो मैं सुनती रही!
वह बोली-“मरघट की राह
मैं कभी जाती न थी!
लेकिन अब जाती हूँ उस ओर
लगता है, पिता होंगे यहीं कहीं!”
सच तो यह है-
पिता कहीं जाते नहीं!
रहते हैं आजीवन साथ हमारे
बस! उन्हें हम देख पाते नहीं!
मीना जैन




