साहित्य

बर्निंग इशू… मेंटल हेल्थ

 मधु माहेश्वरी

मेरे पति हर साल जिंदल सेंटर में आते हैं..
हर साल?क्यों? सुना है बड़ा ही एक्सपेंसिव है वो?शायद वहाॅं पर साइकोलॉजिकल प्रॉब्लम्स का इलाज होता है..मतलब ऐसा कुछ पढ़ा था मैंने…
कमाल है तेरे शहर में ये सेंटर है और तुझे इसकी सही जानकारी भी नहीं?
इतना छोटा भी नहीं है ये शहर!!अच्छा छोड़ो ये सब,तुम बताओ कि तुम्हारे हसबैंड यहाँ और वो भी हर साल?
पढ़े लिखे लोगों की भी समझ छोटी ही होती है,
रीना अपनी सखी ध्वनि की नासमझी पर थोड़ा सा झल्लाते हुए बोली_अपनी मेंटल हेल्थ के लिए..जैसे शारीरिक स्वास्थ्य के बारे में हम जागरूक रहते हैं,ठीक वैसे ही मेंटल हेल्थ भी ठीक रहनी होगी।सौ झमेले व्यापार में,ज्वाइंट फैमिली,आज इसकी बीमारी,कल उसकी शादी।हफ्ते/दस दिन यहाँ आते हैं और दुरुस्त होकर जाते हैं।
राज़ की बात बताऊं?मैंने तो इस बार खुद भी एक सेशन लिया है।अपने अल्प शिक्षित होने का गिल्ट था,अब अपनी इस कमी को अलग नज़रिए से देखती हूँ। बल्कि गिल्ट एकदम ख़त्म।अब अपने गुणों को तराशने पर ध्यान देती हूँ।
खुलकर बात करनी चाहिए मेंटल हेल्थ पर,ये कोई पागलपन नहीं होता।हम में से हर कोई किसी न किसी मानसिक समस्या से जूझ रहा है क्योंकि सुनने वाला कोई नहीं,उपदेश देने वाले अनगिनत हैं।
ज़रा ऊंचा सुनने वाले पिता कोअपने ही बेटों द्वारा फोन पर उपहास उड़ाया जाना कभी-कभी सुन जाता तो उन्हें अपनी ज़िंदगी पर धिक्कार होने लगता ।यूॅं भी पत्नी की मृत्यु के बाद वे भावनात्मक रूप से पूरी तरह एकाकी हो गए थे।उनकी दुनियाॅं उनके कमरे मे सिमट गई थी।एक दिन उन्होंने अपना सर खंबे से दे मारा ।डॉक्टर ने कहा ये डिप्रेशन में चले गए हैं । इन्हें भरपूर प्यार और आप सबका सहयोग चाहिए।
डिप्रेशन मूड डिसऑर्डर की वह अवस्था है जो इंसान को लगातार उदासी की तरफ धकेलती रहती है। धीरे-धीरे वह इंसान स्वयं से,आसपास के माहौल से, रिश्तेदारों /मित्रों/परिवार /समाज से दूर होता जाता है और स्वयं को एकाकीपन के घेरे में क़ैद कर लेता है जहाॅं तरह-तरह के ख़्याल आकर उसके दिमाग को ट्रिगर करते रहते हैं।वह स्वयं को नकारा /बेकार /अवांछित समझने लगता है और अंततः स्वयं को नुकसान पहुॅंचाने या आत्महत्या की तरफ क़दम बढ़ा लेता है।
हालांकि ज़िंदगी के किसी न किसी पड़ाव पर हम सभी उदास होते हैं …स्त्री,पुरुष,बच्चे, किशोर, युवा, बुजुर्ग… हर उम्र के लोग डिप्रेशन का शिकार हो सकते हैं। कभी डिप्रेशन हल्का-फुल्का होता है और थोड़े समय में स्वयं ही ठीक हो जाता है कभी मध्यम दर्जे का,जो काउंसिलिंग या हल्की दवा से ठीक हो जाता है लेकिन एक्सट्रीम तनाव  या सीवियर मेंटल डिसऑर्डर आत्मघाती भी हो सकता है ।
अकारण कुछ भी नहीं होता।डिप्रेशन भी एक्शन का रिएक्शन होता है।चलिए कुछ कारणों पर ग़ौर करते हैं …
आनुवांशिक कारण,जेनेटिक समस्याएं,जीवन में अचानक कोई बड़ा परिवर्तन आ जाना,शारीरिक/ मानसिक/ भावनात्मक आघात, जीवन का स्ट्रेसफुल होना,लाइलाज बीमारियों से  घिरे होना,आवारा नकारा संतान,ग़रीबी,हार्मोनल परिवर्तन,मेनोपॉज,गर्भावस्था, अकेलापन_ विशेष कर युवाओं और बुजुर्गों में,आत्म सम्मान दांव पर लगना,जीवन के प्रति निराशावादी दृष्टिकोण,शारीरिक /मानसिक/ भावनात्मक/ यौन शोषण,एकेडेमिक प्रतियोगिताएं ,अच्छे स्कूल-कॉलेज में दाखिला,रैगिंग,स्टडी को लेकर बच्चों पर पारिवारिक,सामाजिक प्रेशर,जीवन में अपने आप से बहुत ज्यादा उम्मीदें रखना,जॉब, करियर,तनावपूर्ण गृहस्थी,डाइवोर्स,सिंगल पेरेंट,शराब और नशीली दवाओं का दीर्घकालिक सेवन,सामाजिक  प्रताड़ना या अति संवेदनशील व्यक्तित्व.. यानी अनगिनत कारण है जो आपको डिप्रेशन में ले जा सकते हैं,आपकी मेंटल हेल्थ को प्रभावित कर सकते हैं ।
सोशल मीडिया पर अत्यधिक समय बिताना,देर रात तक चैटिंग और सूरज चढ़ने पर बिस्तर छोड़ना भी जहां आपकी बॉडी क्लॉक को प्रभावित करता है वहीं आपकी मेंटल हेल्थ को भी बिगाड़ता है।
स्कूलों में सोशियो इमोशनल लर्निंग रूम की स्थापना के प्रयास  सरकार गंभीरता से ले रही है ताकि स्टूडेंट्स का भावनात्मक विकास और तनाव प्रबंधन समय रहते हो सके।प्रयास तो ये भी चल रहे हैं कि अभिभावकों की भी नियमित काउंसलिंग हो ताकि बच्चे खुलकर उनसे अपने मन की बात कह सकें।
आज के भौतिकतावादी दौर ने हर किसी की मानसिक शांति छीनकर उसे सपनों की उड़ान और ज़िंदगी की बेहिसाब रफ़्तार दी है जहां ज़रा सी असफलता हताशा को जन्म दे देती है।अब हर कोई तो हमेशा सफ़ल या हमेशा अव्वल नहीं आ सकता न?हम बच्चों को बड़ा आदमी बनने का आशीर्वाद देते हैं और वे मानसिक स्वास्थ्य से जूझते हुए भी बड़ा आदमी बनने का जुगाड करते रहते है,शांत सच्चा जीवन जीना भूल ही जाते हैं।
बच्चों की बेस्ट परवरिश की खा़तिर अभिभावक जीना भूलकर atm बनने में लग जाते है।मेंटल हेल्थ तो छोड़िए,अपनी फिजिकल हेल्थ की भी परवाह नहीं करते।वही अभिभावक जब अपनी ही संतानों द्वारा बुढ़ापे में इग्नोर किए जाते हैं तो उनमें भावनात्मक असंतुलन आने लगता है और उन्हें जरूरत पड़ती है इमोशनल मैनेजमेंट की।
भारत में यूनिवर्सिटीज में सर्वे के दौरान पाया गया कि 2.4% विद्यार्थी स्टडीज स्ट्रेस को लेकर सीवियर डिप्रेशन से जूझ रहे हैं।  वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन कहता है कि दुनियाॅं के लगभग 280 मिलियन लोग डिप्रेशन की चपेट में हैं ।मिडल ईस्ट, नॉर्थ अफ्रीका, साउथ एशिया और अमेरिका में मेंटल हेल्थ  बड़ी समस्या के रूप में उभर रही है।।भारत दुनियाॅं का सर्वाधिक अवसाद ग्रस्त देश है दूसरे नंबर पर डब्ल्यूएचओ ने चीन को रखा है ।
ITR इकोनॉमिक्स के अनुसार 2030 से 2036 के बीच बहुत बड़ा वाला डिप्रेशन का दौर आने वाला है ।
बेशक डिप्रेशन मनोरोग है लेकिन इसके शारीरिक प्रभाव भी कम नहीं.. हार्ट प्रॉब्लम, निरंतर सिर दर्द ,पेचिश, इनडाइजेशन, दुबलापन या मोटापा, अत्यधिक थकावट, भूख/ नींद का अत्यधिक बढ़ना या  कम हो जाना ,उदासी, क्रोध, चिड़चिड़ापन, एंग्जायटी, अत्यधिक संवेदनशीलता ,मेमोरी लॉस ,जीवन में निराशा आ जाना ,परिवार /समाज /स्वयं के प्रति अरुचि इत्यादि प्रभाव रोगी के व्यवहार, व्यक्तित्व, सोच  ..सबको प्रभावित करते हैं और अंततः जीवन का रुख़ ही बदल देते हैं।
इमोशनल उथलपुथल का त्वरित प्रबंधन बहुत ज़रूरी है ।ध्यान रहे कि यह एक मनोरोग है, मानसिक समस्या है पागलपन नहीं ।इसलिए बेहिचक मनोचिकित्सक से परामर्श करें। मरीज़ को चाहिए कि किसी भी परिस्थिति में स्वयं को अकेला ना करे।संवाद कायम रहना बहुत ज़रूरी है।अक्सर परेशानियों से अकेले जूझते रहने वाले ही मेंटल हेल्थ की चपेट में ज़्यादा आते हैं ।
आजकल बच्चे उच्च शिक्षा,प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी या नौकरी के सिलसिले में परिवार से दूर अकेले हॉस्टल या मैस में रहते हैं जिनके पास विशेष कर असफलता के समय मानसिक संबल देने वाला पारिवारिक सपोर्ट नहीं होता।ऐसे में डिप्रेशन की चपेट में आने के आसार अधिक हैं तो बच्चों से दूर एकाकी जीवन जीने वाले बुज़ुर्ग भी कभी कभी अवसाद में चले जाते हैं।इसका सहज हल ये हो सकता है कि हम जहाॅं भी रहें,सामाजिक रिश्ते बनाकर रखें ताकि संवाद बना रहे।योग,प्राणायाम ,सुबह शाम की सैर,मोटिवेशनल बातें सुनना,सकारात्मक सोचना मानसिक स्वास्थ्य हेतु कारगर उपाय हैं।
शैक्षणिक संस्थान हों,ऑफिस हों,प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए जी तोड़ मेहनत करता युवा हो…हर जगह आज जबरदस्त प्रेशर है…काम का प्रेशर,पियर प्रेशर,सामाजिक प्रेशर,पारिवारिक प्रेशर,ऊंचे ऊंचे सपनों को साकार करने का प्रेशर,आर्थिक प्रेशर।यानी चारों ओर से पड़ने वाले ज़रूरी/गैर ज़रूरी दबाव इंसान की मेंटल हेल्थ को प्रभावित करते रहते हैं और हम इस बारे में किसी डॉ या काउंसलर से बात तक करने में हिचकिचाते हैं।कभी कभी तो परिवार तक से खुलकर बात नहीं करते।बस अंदर ही अंदर सहते,कुढ़ते,पिसते जाते हैं,क्यूँ? क्यूंकि मेंटल हेल्थ पर बात करना आज भी लज्जाजनक माना जाता है?
किसी भी इंसान में सब कुछ नहीं हो सकता लेकिन हर इंसान में निश्चित तौर पर कुछ न कुछ ज़रूर होता है ।कभी-कभी हम ऐसे सपने पाल लेते हैं  जिनका पोटेंशियल,जिनका कैलिबर हमारे अंदर नहीं होता। बार-बार सपनों का टूटना,बार-बार आने वाली असफलताएं भी कभी-कभी हमें डिप्रेशन की तरफ़ धकेलने के लिए काफ़ी होती हैं ।जिंदगी सिर्फ़ सपनों के पीछे भागने का ही नाम नहीं,जिंदगी प्यार से जीने का भी नाम है। ना स्वयं पर अतिरिक्त उम्मीदों का बोझ डालें, ना ही अपने बच्चों पर अपने सपनों का बोझ डालें।
जीवन में उतार चढ़ाव आना सामान्य बात है उन्हें सामान्य रूप में ही लें ।कोरोना के दौरान एक बहुत बड़ा युवा वर्ग डिप्रेशन में चला गया। लंबे- चौड़े लोन तले पलते बड़े-बड़े सपने और अचानक कोविड की लंबी मार तले कई नौकरियों का चले जाना, व्यापार का ठप्प हो जाना.. इन सब ने बहुत सारे लोगों को या तो डिप्रेस्ड किया या फिर आत्महत्या की तरफ प्रेरित किया। कोरोना ने सरल- सहज जीवन की सीख दी लेकिन परिस्थितियाॅं बदलते ही हम फिर सपनों के गुलाम होने लगे। हमें एक बार फिर उसी सीधी सरल सहज ज़िंदगी की तरफ़ लौटना होगा जहाॅं जीवन जीए जाते थे।
क्या यह संभव है कि किसी इंसान को कभी भी डिप्रेशन ना हुआ हो इस सवाल के उत्तर में सुप्रसिद्ध मनोचिकित्सक बिल डीकिन कहते हैं कि अगर हमारा मस्तिष्क अलग-अलग परिस्थितियों के हिसाब से स्वयं को ढालना सीख ले तो डिप्रेशन की नौबत कभी नहीं आएगी।ज़ाहिर है कि अपने लिए हमें स्वयं भी प्रयास करने होंगे।लेकिन हर बार हम अपनी मेंटल हेल्थ से स्वयं ही निपट लें,ये संभव नहीं।हाल ही में बेंगलुरु में बच्चों के लिए एक मेंटल हेल्थ कैंप लगाया गया जिसमें हर उम्र के बच्चों ने बढ़ चढ़ कर भाग लिया और अपनी अपनी समस्याएं भी बेहिचक सांझा की।कभी कभी सामने वाले को सिर्फ़ शांत मन से,बिना जज किए हुए सुनने मात्र से भी कई मानसिक गुत्थियां सुलझ सकती है जिसके लिए बड़ा धैर्य चाहिए होता है।
थोड़ा मुश्किल ज़रूर है पर नामुमकिन नहीं।

मधु माहेश्वरी, गुवाहाटी असम

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