
एक बात समझ में नहीं आती है
मुझको कि जब कुछ मित्र कहते हैं
कि एक जनवरी भारत का नववर्ष
नहीं और वह हमको स्वीकार नहीं।
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’
की कविता का संदर्भ देकर उनकी
कविता पोस्ट कर कहते हैं दिनकर
जी ने भी यह अस्वीकार किया था।
जिस कविता को संदर्भित करते हैं,
शायद दिनकर की रचना वह नही,
क्योंकि उनकी रचनाओं में कहीं भी
वह कविता किसी को मिली ही नहीं।
यह वृत्तांत लिखने का तात्पर्य यह है
कि जो लोग यह कहकर भारतीय
कहलाने का पूरा तो ज़ोर लगाते हैं
पर देवनागरी स्वयं नहीं लिख पाते हैं।
वे देवनागरी लिपि को रोमन अंग्रेज़ी
में लिखकर एक जनवरी को नववर्ष
मानने वालों का उपहास उड़ाते हैं,
हास्य व्यंग्य से उनका विरोध जताते हैं।
स्पष्ट है कि वे भारतीयता से ओत
प्रोत मित्र इतना सा प्रयत्न नहीं करते
कि देवनागरी लिपि में लिख सकने
का थोड़ा सा अभ्यास कर सकते।
एक अन्य पोस्ट मिलती है कि “लोग
संस्कृत पढ़ने व पढ़ाने का भाषण
दूसरों पर झाड़ते हैं पर अपने बच्चे
अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूल में पढ़ाते हैं।
ताज्जुब है कि ऐसी पोस्ट का सीधा
समर्थन करने वाले भी रोमन अंग्रेज़ी
में ही अपना सारा विरोध जताते हैं,
हाँ, विश्वबंधुत्व की बात तो करते हैं।
हिन्दी, अंग्रेज़ी, फ़्रेंच, संस्कृत,मराठी,
उर्दू, बंगाली, पंजाबी, तमिल, तेलगू,
कन्नड़, मलयालम, जर्मन आदि सभी
भाषाएँ सदा मानव का ज्ञान बढ़ाती हैं।
दीवाली, दशहरा, दुर्गापूजा, ओणम,
पोंगल, बिहू, ईद हम उत्साह के साथ
मनाते हैं, जब यही पर्व विदेशों में भी
मनाये जाते है तो हम बड़ा गर्व करते हैं।
अमेरिका, ब्रिटेन या अन्य किसी देश
की संसद में जब कोई संस्कृत का
श्लोक या स्त्रोत पढ़ा जाता है, हमारा
मस्तक तब गर्व से ऊँचा उठ जाता है।
फिर हम क्यों नही दूसरों की भाषा
संस्कृति से भी प्रेम कर सकते हैं?
नहीं करना है न करो, पर ऐसा करने
वालों की आलोचना तो नहीं करो।
विश्वबंधुत्व का पाठ भारत से विश्व
भर में भेजा जाता है, विश्वगुरू हम हैं,
कहा जाता है, पर सबकी ख़ुशियों में
शामिल होने में हमें बुरा क्यों लगता है।
मेरे विचार से सबको साथ लेकर
सबकी भाषा, संस्कृति का सबके
त्योहारों का भारतवासी सम्मान करें,
आदित्य विश्वगुरू के दर्जे का मान रखें।
विद्यावाचस्पति डॉ कर्नल
आदिशंकर मिश्र ‘आदित्य’
लखनऊ



