
ज़िन्दगी बंद लिफाफे सी
क्या लिखा मालूम नहीं!!
तकदीर भी है रुठी रुठी,
कल तक जो अपने थे,
लोग आज पराए हैं!!
करते रहते हैं कोशिश,
मुझको रोज गिराने की!!
बेशक मुझको भी आता है
तन्हाई से अपनी लड़ना!!
जीत नहीं पाएंगे मुझसे
लाख करे चतुराई भी!!
ज़िन्दगी बंद लिफाफे सी
क्या लिखा मालूम नहीं!!
बहुत परेशान करते हैं
अपने कुछ जज्बात मगर!!
कठिनाई से पार है पाना,
प्रीत है वह भी परायी सी!!
जीवन कटा है मुश्किल में
घटना है प्रीत निभाने की!!
ठोकर ही से समझे हैं हम,
जीवन नहीं गवाने की….
– राजीव त्रिपाठी
उदयपुर राजस्थान




