
है यज्ञकर्म कराता आत्मशुद्धि धैर्य शुचिता बलबुद्धि विशुद्ध ।
हवि फैलाता पावनता सर्वत्र,मंत्र कराता मन वाणी कर्म शुद्ध।।
यज्ञ कर्म ,श्रत् कर्म धर्म है, पंच यज्ञ को निशिदिन करना।
ब्रह्म, देव ,भूत ,पितृ और अतिथि यज्ञ कर तृप्त है करना।।
ब्रह्मयज्ञ तो ईश यजन,वेदपाठ है,देवयज्ञ हवि देकर यज्ञकाकरना।भूतयज्ञ,वलिवैश्य देवकर्म है,श्वानधेनुकृमिकाग को तृप्तहैकरना।।
पितृयज्ञ,श्रद्धा से अर्पणतर्पण है,जीवित पितरों की सेवा करना।
अतिथि यज्ञ अभ्यागत की सेवा है, मानसहित संतृप्त है करना।। ब्रह्म,देव,भूत,पितृऔ”अतिथियज्ञ,पंचयज्ञ हर आर्य को करणीय।
परिष्कृत जनजीवन को करते है सोलहसंस्कार सर्वअनुकरणीय।।
गर्भाधान,पुंसवन,सीमन्तोन्नयन है जन्मकाल से पहले हैं करते।
जातकर्म नामकरन निष्क्रमण अन्नप्राशन चूड़ाकर्म कर्णभेद को बचपन में करते।।
उपनयनकर्म,वेदारम्भ,चरण हैं,शिक्षाहित,गुरूकुल को प्रस्थान।
समावर्तन है शिक्षित होकर आना,परिवार जनों में लेना स्थान।।
क्रम से वर्णित बारह संस्कार,हैं ब्रह्मचर्य आश्रम के कर्णधार ।
धर्म,अर्थ,काम का पालन,विवाह कर्म कराता है कर्म अपार।।
गृहस्थाश्रम का पालन अनूप, वान्यप्रस्थी को है बनना अवधूत। संन्यासी तो होता जगका न्यासी,अन्त्येष्टि कराता मोक्ष भवभूत।।क्रमशः4
✍️चन्द्रगुप्त प्रसाद वर्मा “अकिंचन”




