
वह प्रैक्टिकल आदमी था।
जो भी चाहिए ,जीने के लिए
उसके पास वह सब था,
गाड़ी थी ,मकान था।
अच्छी नौकरी थी।
एक बीवी थी।
एक अदद भगवान था।
बस, स्वाभिमान से उसका,
न कोई नाता था।
इसीलिए बॉस के आगे-पीछे,
दुम हिलाता था।
बॉस भी अँधा था ,
रेवड़ियाँ बाँटता था।
यह हर बार रेवड़ियाँ
पा जाता था।
रेवड़ी पा वह,
खीसें निपोरता था ।
पीठ पीछे गुर्राता था।
बखूबी दोहरी ज़िंदगी,
निभाता था।
कभी-कभी खुदा से भी,
खौफ़ खाता था।
बोझ बढ़ जाने पर,
अपने पर्सनल भगवान् से
शेयर कर आता था।
जी-हुज़ूरी उसे ,
खूब फल रही थी।
तकदीर उसकी संवर रही थी।
एक और भी था वहाँ,
टाट में लगे रेशमी पैबंद सा,
दूर से ही झिलमिलाता था।
वह आदर्शवाद का प्रोडेक्ट था।
उसने योग्यता के बूते पर,
जॉब पाई थी ,निष्ठा और
ईमानदारी की घुट्टी ,
उसे गई पिलाई थी।
वह समर्पित भाव से
कर्तव्य निभाता था,
बस इस माहौल में,
खुद को अनफिट पाता था।आसपास जो घट रहा था,
उस पर उसे विश्वास
न आता था।
वह सत्य का पुजारी था,
मूल्यों को जीता था ।
अवमूल्यन आदर्शों का,
उसका अंतर भिगोता था।
उसके अगल-बगल के लोग
ऊँची छलाँगे लगा रहे थे।
वह सीढ़ी पकड़े बैठा था,
लोग छज्जे पर जा रहे थे
वह इसे नियति मान ,
अपनी गति चल रहा था।
दौड़ में ज़िंदगी की ,
प्रतिपल पिछड रहा था।
एक दिन उसे किसी,
सयाने ने समझाया,
जमाने की फ़ितरत से
अवगत करवाया।
सुन रे बंधु !कहाँ खोया है?
जाग रहा है,या सोया है?
जानता नहीं क्या इतना भी,
सोने वाले का भाग्य
सो जाता है।
विपरीत हवा के चलना
औंधे मुँह गिराता है।
छोड़ दे इस सीढ़ी को
उससे न ऊपर जाएगा।
लिफ्ट का सहारा ले ले,
फौरन मंजिल पाएगा।
लेकिन हाय री विडंबना ,
खरी बात यह,
उसे समझ न आई,
रहा देता सिद्धांतों की दुहाई।
बात समझ आती भी कैसे,
वह तो मूल्यों को ढोता था।
हरिश्चंद्र को रोता था।
उसे हर आदमी में,
ईश्वर नजर आता था।
संवेदनाओं से उसका,
गहरा नाता था।
ज़िंदगी के पेचीदे समीकरण,
वह समझ न पाया था।
उसके लिए सब अपने थे,
न कोई पराया था।
भूल कहाँ हुई,
मन में विचारता था,
एक और एक दो होते हैं,
बस इतना गणित जानता था।
इसीलिए वह ,
जिसके पास सब कुछ था,
खुश नजर आता था,
और यह आदर्शों की ,
सलीब पर चढ़ा,
मसीहा बना
मरता जाता था।
मरता ही जाता था।
वीणा गुप्त
नई दिल्ली




